कुहरे की आँचल धरती के गोद में पसरी हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने ठंडे रुई के फोहे हवा में उड़ा दिए हो। चार साल पहले क्रिसमस के सर्द सुबह में अपने ट्यूशन के स्टैंड से मैं सायकल लॉक करके बाहर निकला। साइकिल चलाने से थोड़ी गर्मी आ गई थी इसलिए कान में लिपटा मफलर अब स्टाइल बनके कांधे पर झूलने लगा था
जब सारा शहर नींद के आगोश में रहता था तब इतनी ठंड में इतनी सुबह ट्यूशन आने की मेरी दो वजहें थीं, एक उनको देख लेना जिन्होंने मेरे दिल का सुकून लूट लिया था और दुसरा उन को दिख जाना जिन्होंने मेरे दिल का सुकून लूट लिया था।
मैथेमेटिक्स अच्छी थी मेरी मगर उसने ही जबरन ट्यूशन आने को कहा था और मुझे आना पड़ा था।
रोज की तरह मुझसे पहले पहुंच कर , वो गेट पे खड़ी थी। ब्लैक जैकेट पे रेड स्टोल डाले। ये स्टोल बहोत प्यारा था ।कभी कभी वो खुश होती तो मेरे गले में फंसाके अपनी नाक मेरे नाक से सटा देती फिर पूछती बताइये मेरे नाक बड़े हैं न आपसे? मैं हाँ कह देता तो कोई बात नही लेकिन ना कह दिया तो कहती ..."आपकी नाक मेरी नाक ....मेरी नाक मेरी नाक। " फिर खुद जोर जोर से हंसते हंसते छुईमुई सी मुझमें सिकुड़ जाती।
कल रात किसी बात पे एक घण्टे तक मैंने उसे डांटा। उसके बाद आधे घण्टे तक रो कर उसने मुझे डेढ़ घण्टे तक डांटा था।
इसलिए हल्की सी तल्खी हो गई थी तो मैं उससे नजरें चुरा के निकलना चाहता था पर वो ऐसे घुर रही थी की मुझे उसकी ओर देखना पड़ा।
ओस की छोटी सी एक बूंद उसके से छोटी नाक के अंतिम छोर पे आ पहुंची थी जहाँ से पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण के हठ से नीचे बुला रही थी मगर वो आने को तैयार नही थी। मैंने जिस एंगल से देखा वहाँ से नोज पिन के झलक में वो बून्द सुनहरी लग रही थी ।
पारदर्शिता पढ़ते वक्त ध्यान में नही आया था मगर उस दिन कंठस्थ हो गया कि स्वच्छ जल पारदर्शी होता है।
क्लास में जाके उसके साइड वाली बेंच पे बैठ गया। रात को झगड़ने से पहले मैंने ट्रिग्नोमेट्री पढ़ी थी इसलिए उसे सुनाने के अंदाज में मैंने एक दोस्त से कहा मुझे ट्रिग्नोमेट्री अभी तक समझ नही आया ।
मैं जानता था आगे क्या होने वाला है। वो मुझसे बदला लेने को सर से ट्रिग्नोमेट्री के सवाल पूछती। सर ट्रिग्नोमेट्री जिन स्टूडेंट्स को आता उनके बोर्ड पे बुलाते जिनको नही आता उन्हें डाँट की घुट्टी पिलाते।
हुआ भी यहीं इसने सर से सवाल पूछा , सर ने पूरे क्लास से पूछा और मुझे छोड़ किसी ने हाथ नही उठाया।
फिर सबको डाँट पड़ी और मैं बोर्ड पे जाके सॉल्व करने लगा और बाकी लोग सर की झिड़की सुनते रहे।
सॉल्व हो जाने के बाद सर ने उससे पूछा ," दिमाग में आ गई बात अब?
वो कुछ बोलती इसके पहले ही मैं बोल पड़ा ,"घुटनो में आया होगा सर इसके पास दिमाग नही है।
सारा क्लास हँसने लगा ," सर ने "भाग बेवकूफ " बोलके मूझे वापस सीट पे भेज दिया।
अगले एक घण्टे के क्लास में वो मुझे ऐसे देखती रही जैसे मैं उस वक्त उसके हत्थे चढ़ गया तो मेरा सर फोड़ देगी।
दिन के तीन बज रहे थे , हल्की हल्की धूप निकली थी मगर बादल आ जारहे थे। कमरें की खिड़की से बदली में छिपा सूरज ऐसे दिख रहा था जैसे चाँद दिन में आगया हो।
मैं रफ कॉपी लिए मैथ्स बनाने में लगा था पर मन नही लग रहा था।
एक अजीब सी बैचेनी हो रही थी। ऐसा तब ही होता है जब सामने वाला आपको याद कर रहा हो। मैंने कलम छोड़ के फोन उठा लिया। उसे कॉल करने का मन किया पर उसने मना किया था कॉल करने से।
इसलिए फोन वापस रख ख्यालों की दुनिया में कही और निकल गया तब तक मोबाइल पे एक बीप हुआ उसका मेसेज आया था , 5 बजे पार्क आना।
प्रेम में टेलीपैथी होता है , लोग दूर रहते हुए भी एक दूसरे के ईमोशन्स जाने जाते हैं । वो जान गई थी।
पार्क वो गुस्से में आई और आते ही फट पड़ी दस मिनट तक डाँटने के बाद मैं जब लड़ने के मूड में नही दिखा तो थकहार के पूछी ," क्या कर रहे थे दिनभर?
"नजरें गन्दी कर रहा था, किसी की तस्वीर देखकर" , मैंने शरारत भरी मुस्कान छुपाने नाकाम कोशिश की।
अपनी नजरों पे इतनी इनायत करने की कोई वजह? उसने एक एक लफ्ज चबा कर कहा।
"नजरों पे कोई इनायत नही कर रहा था बस सोच रहा था। तस्वीर की लड़की की छोटी सी नाक कैसे बड़ी की जाए।"
मैंने पिन कसा।
करोगे मुझे परेशान? चिढाओगे मुझे? आज मुझे पूरे क्लास के सामने मुझे चिढ़ाया। तुम्हें मुझसे प्यार नही हुआ.....तुम छोड़कर चले जाओगे। ," वो रोने लगी या रोने की ऐक्टिंग करने लगी , लेकिन उसके हाथ में फँसी मेरी उंगलिया और जोर से कस गई।
पगली दिल एक बार लगता है , जो बार बार होती है वो दिलग्गी है.......मैं छोड़कर नही जाता भले तुम चली जाओ, ये प्रोमिस है। ,"मैने कहा।
दोनों खामोश बैठे रहे........ उसके आंखों में आंसू आगये थे । बस उम्र बढा था मगर दिल से बच्ची थी वो।
उसने कंधे पे सर टिकाते हुए कहा ," 12th के बाद वाईज़ैग चलोगे? मेरी ग्रेजुएशन वही से होगी।
मैंने कहा ," मुझे लॉ करना है , पटना रुकना होगा या फिर बनारस जाना होगा।"
"इसका मतलब हमें अलग रहना होगा? " उसने कहा।
अलग नही रहना होगा , तुम छोड़कर जा रही हो, सीधे सीधे कहो! ," मैंने चिढ़ाया।
"मैं अलग रहना चाहती हूं? मैं? मैं?" ......वो लड़ पड़ी ,"तुम्हें प्यार नही होता होगा। मगर मुझे है ब्लाइंडली लव तुमसे ।
"बेवकूफ ब्लाइंड लव का कांसेप्ट ही फाल्स है । लोगों को बस खूबसूरत चीजों से प्यार होता है, नही तो इंसान खूबसूरत लोग के साथ चाहता ही क्यों? ," मैं उसे और लड़ते हुए देखना चाहता था।
"अच्छा तो तुम्हें भी मेरी खूबसूरती से प्यार हुआ है? मेरी फीलिंग्स तो तुमने समझी नही होगी?", वो लड़ने की मूड में आगई थी।
मैंने हंसी छुपाते कहा ," समझा न......तुम्हारी फीलिंग तुमसे ज्यादा खूबसूरत हैं।"
अब मुझे एक्सप्लेनेशन मत दो, तुम्हें मुझसे नही मेरे चेहरे से प्यार है ।
चले जाओ यहाँ से जल्दी वरना मुझसे बुरा कोई नही होगा।
चरम पे पहूंच गए उसके गुस्से पे पानी मारते हुए मैने कहा ,"अच्छा चॉकलेट तो खिला दे जो लाई है।
"नही ख़िलाती, जाओ खूबसूरत चॉकलेट ढूंढो" उसने सर हिलाते हुये मुंह बनाया।
हंसी दबाते हुए मैंने उससे कहा
" ठीक हैं फिर एक बार नाक से नाक लड़ा।"
"नही लड़ाती ...... तुम्हारी बड़ी है मेरी छोटी तुम हरा देते हो हर बार" ........ मासूमियत ओढ़े उसने रुआंसे होकर कहा.
इस वक्त वो इतनी प्यारी लगी की मैंने जबरन उसे सर से सर लगा लिया। उसने धीमे से कहा ," तुम हमेशा ऐसे ही क्यों नही रहते , चिढ़ाते क्यों हो मुझे?
ऐसे ही सेक्सी लगता है। कहकर मैं हँसने लगा वो मुझपे मुक्के बरसाने लगीं। दोनो देर तक बैठे रहे।
चलने को हुए तो उसने कहा KC सिन्हा के बुक क कवर पे तुम्हारे नाम के साथ अपना नाम लिख दिया है। " विनीत & ज्योति" मिटाना मत भले कवर में छुपा देना।
मैंने हामी भर दी मगर किस्मत ने नही ,उसने कुछ अलग ही लिखा था। चार साल बाद आज मैं वाइजैग में बैठा हूँ और वो बनारस में।
जब सारा शहर नींद के आगोश में रहता था तब इतनी ठंड में इतनी सुबह ट्यूशन आने की मेरी दो वजहें थीं, एक उनको देख लेना जिन्होंने मेरे दिल का सुकून लूट लिया था और दुसरा उन को दिख जाना जिन्होंने मेरे दिल का सुकून लूट लिया था।
मैथेमेटिक्स अच्छी थी मेरी मगर उसने ही जबरन ट्यूशन आने को कहा था और मुझे आना पड़ा था।
रोज की तरह मुझसे पहले पहुंच कर , वो गेट पे खड़ी थी। ब्लैक जैकेट पे रेड स्टोल डाले। ये स्टोल बहोत प्यारा था ।कभी कभी वो खुश होती तो मेरे गले में फंसाके अपनी नाक मेरे नाक से सटा देती फिर पूछती बताइये मेरे नाक बड़े हैं न आपसे? मैं हाँ कह देता तो कोई बात नही लेकिन ना कह दिया तो कहती ..."आपकी नाक मेरी नाक ....मेरी नाक मेरी नाक। " फिर खुद जोर जोर से हंसते हंसते छुईमुई सी मुझमें सिकुड़ जाती।
कल रात किसी बात पे एक घण्टे तक मैंने उसे डांटा। उसके बाद आधे घण्टे तक रो कर उसने मुझे डेढ़ घण्टे तक डांटा था।
इसलिए हल्की सी तल्खी हो गई थी तो मैं उससे नजरें चुरा के निकलना चाहता था पर वो ऐसे घुर रही थी की मुझे उसकी ओर देखना पड़ा।
ओस की छोटी सी एक बूंद उसके से छोटी नाक के अंतिम छोर पे आ पहुंची थी जहाँ से पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण के हठ से नीचे बुला रही थी मगर वो आने को तैयार नही थी। मैंने जिस एंगल से देखा वहाँ से नोज पिन के झलक में वो बून्द सुनहरी लग रही थी ।
पारदर्शिता पढ़ते वक्त ध्यान में नही आया था मगर उस दिन कंठस्थ हो गया कि स्वच्छ जल पारदर्शी होता है।
क्लास में जाके उसके साइड वाली बेंच पे बैठ गया। रात को झगड़ने से पहले मैंने ट्रिग्नोमेट्री पढ़ी थी इसलिए उसे सुनाने के अंदाज में मैंने एक दोस्त से कहा मुझे ट्रिग्नोमेट्री अभी तक समझ नही आया ।
मैं जानता था आगे क्या होने वाला है। वो मुझसे बदला लेने को सर से ट्रिग्नोमेट्री के सवाल पूछती। सर ट्रिग्नोमेट्री जिन स्टूडेंट्स को आता उनके बोर्ड पे बुलाते जिनको नही आता उन्हें डाँट की घुट्टी पिलाते।
हुआ भी यहीं इसने सर से सवाल पूछा , सर ने पूरे क्लास से पूछा और मुझे छोड़ किसी ने हाथ नही उठाया।
फिर सबको डाँट पड़ी और मैं बोर्ड पे जाके सॉल्व करने लगा और बाकी लोग सर की झिड़की सुनते रहे।
सॉल्व हो जाने के बाद सर ने उससे पूछा ," दिमाग में आ गई बात अब?
वो कुछ बोलती इसके पहले ही मैं बोल पड़ा ,"घुटनो में आया होगा सर इसके पास दिमाग नही है।
सारा क्लास हँसने लगा ," सर ने "भाग बेवकूफ " बोलके मूझे वापस सीट पे भेज दिया।
अगले एक घण्टे के क्लास में वो मुझे ऐसे देखती रही जैसे मैं उस वक्त उसके हत्थे चढ़ गया तो मेरा सर फोड़ देगी।
दिन के तीन बज रहे थे , हल्की हल्की धूप निकली थी मगर बादल आ जारहे थे। कमरें की खिड़की से बदली में छिपा सूरज ऐसे दिख रहा था जैसे चाँद दिन में आगया हो।
मैं रफ कॉपी लिए मैथ्स बनाने में लगा था पर मन नही लग रहा था।
एक अजीब सी बैचेनी हो रही थी। ऐसा तब ही होता है जब सामने वाला आपको याद कर रहा हो। मैंने कलम छोड़ के फोन उठा लिया। उसे कॉल करने का मन किया पर उसने मना किया था कॉल करने से।
इसलिए फोन वापस रख ख्यालों की दुनिया में कही और निकल गया तब तक मोबाइल पे एक बीप हुआ उसका मेसेज आया था , 5 बजे पार्क आना।
प्रेम में टेलीपैथी होता है , लोग दूर रहते हुए भी एक दूसरे के ईमोशन्स जाने जाते हैं । वो जान गई थी।
पार्क वो गुस्से में आई और आते ही फट पड़ी दस मिनट तक डाँटने के बाद मैं जब लड़ने के मूड में नही दिखा तो थकहार के पूछी ," क्या कर रहे थे दिनभर?
"नजरें गन्दी कर रहा था, किसी की तस्वीर देखकर" , मैंने शरारत भरी मुस्कान छुपाने नाकाम कोशिश की।
अपनी नजरों पे इतनी इनायत करने की कोई वजह? उसने एक एक लफ्ज चबा कर कहा।
"नजरों पे कोई इनायत नही कर रहा था बस सोच रहा था। तस्वीर की लड़की की छोटी सी नाक कैसे बड़ी की जाए।"
मैंने पिन कसा।
करोगे मुझे परेशान? चिढाओगे मुझे? आज मुझे पूरे क्लास के सामने मुझे चिढ़ाया। तुम्हें मुझसे प्यार नही हुआ.....तुम छोड़कर चले जाओगे। ," वो रोने लगी या रोने की ऐक्टिंग करने लगी , लेकिन उसके हाथ में फँसी मेरी उंगलिया और जोर से कस गई।
पगली दिल एक बार लगता है , जो बार बार होती है वो दिलग्गी है.......मैं छोड़कर नही जाता भले तुम चली जाओ, ये प्रोमिस है। ,"मैने कहा।
दोनों खामोश बैठे रहे........ उसके आंखों में आंसू आगये थे । बस उम्र बढा था मगर दिल से बच्ची थी वो।
उसने कंधे पे सर टिकाते हुए कहा ," 12th के बाद वाईज़ैग चलोगे? मेरी ग्रेजुएशन वही से होगी।
मैंने कहा ," मुझे लॉ करना है , पटना रुकना होगा या फिर बनारस जाना होगा।"
"इसका मतलब हमें अलग रहना होगा? " उसने कहा।
अलग नही रहना होगा , तुम छोड़कर जा रही हो, सीधे सीधे कहो! ," मैंने चिढ़ाया।
"मैं अलग रहना चाहती हूं? मैं? मैं?" ......वो लड़ पड़ी ,"तुम्हें प्यार नही होता होगा। मगर मुझे है ब्लाइंडली लव तुमसे ।
"बेवकूफ ब्लाइंड लव का कांसेप्ट ही फाल्स है । लोगों को बस खूबसूरत चीजों से प्यार होता है, नही तो इंसान खूबसूरत लोग के साथ चाहता ही क्यों? ," मैं उसे और लड़ते हुए देखना चाहता था।
"अच्छा तो तुम्हें भी मेरी खूबसूरती से प्यार हुआ है? मेरी फीलिंग्स तो तुमने समझी नही होगी?", वो लड़ने की मूड में आगई थी।
मैंने हंसी छुपाते कहा ," समझा न......तुम्हारी फीलिंग तुमसे ज्यादा खूबसूरत हैं।"
अब मुझे एक्सप्लेनेशन मत दो, तुम्हें मुझसे नही मेरे चेहरे से प्यार है ।
चले जाओ यहाँ से जल्दी वरना मुझसे बुरा कोई नही होगा।
चरम पे पहूंच गए उसके गुस्से पे पानी मारते हुए मैने कहा ,"अच्छा चॉकलेट तो खिला दे जो लाई है।
"नही ख़िलाती, जाओ खूबसूरत चॉकलेट ढूंढो" उसने सर हिलाते हुये मुंह बनाया।
हंसी दबाते हुए मैंने उससे कहा
" ठीक हैं फिर एक बार नाक से नाक लड़ा।"
"नही लड़ाती ...... तुम्हारी बड़ी है मेरी छोटी तुम हरा देते हो हर बार" ........ मासूमियत ओढ़े उसने रुआंसे होकर कहा.
इस वक्त वो इतनी प्यारी लगी की मैंने जबरन उसे सर से सर लगा लिया। उसने धीमे से कहा ," तुम हमेशा ऐसे ही क्यों नही रहते , चिढ़ाते क्यों हो मुझे?
ऐसे ही सेक्सी लगता है। कहकर मैं हँसने लगा वो मुझपे मुक्के बरसाने लगीं। दोनो देर तक बैठे रहे।
चलने को हुए तो उसने कहा KC सिन्हा के बुक क कवर पे तुम्हारे नाम के साथ अपना नाम लिख दिया है। " विनीत & ज्योति" मिटाना मत भले कवर में छुपा देना।
मैंने हामी भर दी मगर किस्मत ने नही ,उसने कुछ अलग ही लिखा था। चार साल बाद आज मैं वाइजैग में बैठा हूँ और वो बनारस में।