मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

शौर्य दिवस

मुल्ला मुलायम का दम्भ "परिंदा भी पर
नहीं मार सकता", और वाकई मुल्ले मुलायम ने
जबरदस्त तैयारियां कीं थीं। मुस्लिम
परस्ती में औरंगजेब भी कहीं दूर पीछे छूट
चुका था उस वक्त, जिसे हम आजादी या
स्वाधीनता कहते हैं। आप ये देखिये सब्जी
मंडियों, अनाज मंडियों को भी अस्थाई
जेल बना दिया गया था। जगह जगह
गिरफ्तारियां पूरे प्रदेश को ही जेल बना
दिया गया था। सरकार की मुस्लिम
परस्ती का आलम ये था कि अगर आप
अभिवादन में राम राम कहते थे और अगर
किसी पुलिस वाले ने या किसी सपाई ने
सुन लिया तो आप बिना किसी कारण के
गिरफ्तार हो जाते थे। वाकई उस दौर में हम
लोग अनुमान लगाते थे कि मुस्लिम शासन में
हमारे पूर्वज किस तरह जीवन जीते होंगे, और
हमारा सर उनकी जिजीविषा के प्रति
श्रद्धावनत हो जाता था कि कितनी
विपरीत परिस्थितियों के बाद भी धर्म
को बचाए रखा। कितना कंटकाकीर्ण
मार्ग होने के बावजूद भी राम जन्म भूमि
को बाबर के पाप से छुड़ाने के लिए
लगातार लड़ाइयां लड़ते रहे।शायद ३०
अक्टूबर १९९० था, सुबह से एक अजीब
सन्नाटा पसरा था, तब आज की तरह
सोशल मिडिया था नहीं, दिन काटना
मुश्किल हो रहा था। आसरा था तो
रेडियो और अख़बार। । सरकार की सख्ती
के कारण फ़ैजाबाद में कोई घुस नहीं सकता
था। पूरे प्रदेश में कर्फ्यू का सा माहौल था,
लेकिन जब मरने पर ही उतारू हो महाकाल के
वंशज तो रोक कौन सकता है। और वही हुआ
शाम ५ बजते ही दैनिक जागरण का स्पेशल
एडिशन आया कि मुलायम की सारी
नाकेबन्दी को धता बता कर "एक गुम्बद पर
भगवा फहरा दिया गया" और तो फिर
खुशियों की अतिरेक....... वो ख़ुशी आज तक
महसूस नहीं हुई। थालियां बजीं, घण्टे बजे,
घी के दिए जले। कर्फ्यू को धता बता कर
पब्लिक सड़क पर आ गई।
उसके बाद के दिन तो बहुत कष्टपूर्ण रहे,
अयोध्या फिर से खून में नहाई अपने
औरंगजेबी फरमान के कारण मुलायम "मुल्ला"
घोषित हुए। लेकिन उसके दो वर्ष बाद ही
हिंदुओं ने ७६ लड़ाइयों और लाखों
बलिदानियों का ऋण चुका अपने पांच सौ
साला कलंक को धो दिया।
बमुश्किल तारीखों को इतिहास बनने का
मौका मिलता है, हिन्दू गर्वोन्मत्त होकर
सर उठाया और छः दिसम्बर १९९२ इतिहास
बन गया। "जय श्री राम"

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