शनिवार, 2 दिसंबर 2017

निकाय चुनाव एक विश्लेषण

एक विश्लेषण~
इन चुनावों में एक चीज स्पष्ट निकल कर सामने आई
16 शहरी निकाय को छोड़ दें तो भाजपा का प्रदर्शन
ग्रामीण और अर्ध्ग्रामीण क्षेत्रों में
अच्छा नहीं रहा।
बुंदेलखंड में भाजपा आम तौर पर साफ़ हो गई, फतेहपुर में
निराशाजनक प्रदर्शन रहा, हरदोई में सूपड़ा साफ़ हो गया। उन्नाव में
अपना आधार गंवाया, फर्रुखाबाद में वोटों में घटत साफ़ दिखाई
दी।
भाजपा ने नगरपालिका में 1 तिहाई (33%) सीटों पर और
नगरपंचायतों में सिर्फ 1 चौथाई (25%) सीटों पर
ही सफलता हासिल करी। स्पष्ट है
ग्रामीण क्षेत्रों की जनता ने
इनकी नीतिओं को स्पष्ट तौर पर नकार दिया
परन्तु शहरी क्षेत्र के लोग आर्थिक मामलों के कुछ
कम जानकार निकले
प्रदेश भर में 298 नगर परिषद और 438 नगर पंचायत में
बीजेपी बुरी तरह पराजित हुई
है।
शहरी क्षेत्र में गोरखपुर में जिस वार्ड में जहाँ
योगी आदित्यनाथ ने खुद वोट दिया वहां भाजपा पार्षद
प्रत्याशी खुद चुनाव हार गया। कानपुर में राष्ट्रपति
श्री रामनाथ कोविंद के वार्ड से भाजपा हार गई। वहां
बसपा प्रत्याशी ने रेकॉर्डतोड़ तरीके से
जीत हासिल की और भाजपा
की प्रत्याशी तीसरे स्थान पर
रह गई।
मजेदार खबर झींझक नगरपालिका कानपुर से आई जहाँ
से राष्ट्रपति की भतीजी
पालिकाध्यक्ष के चुनाव में हार गई। वो भाजपा से टिकट मांग
रही थीं और न मिलने पर
निर्दलीय समर के कूद पड़ीं। आखिर में
उनको 363 मतों से संतोष करना पड़ा जो कुल मतदान के 3 प्रतिशत
से भी कम रहा। यहाँ बसपा प्रत्याशी
विजयी रही जबकि भाजपा दूसरे स्थान पर
रही जिनको विजयी प्रत्याशी
से मात्र 100 मत कम मिले।
शहरी क्षेत्रों में मतदाता ने भाजपा को पूर्ण रूप से
नकारा नहीं है और वो कहीं न
कहीं इनकी नीतियों पर भरोसा
करके चल रहा है। उसका क्षेत्रीय दलों से विश्वास
उठा हुआ है और राष्रीय स्तर पर वो
विकल्पहीनता की स्थिति में है। फिलहाल
आने वाले राज्यों के चुनाव काफी चीजों को
स्पष्ट कर देंगे। राजनीती की
दिशा वैसे भी निकाय चुनाव तय नहीं कर
पाते। पिछले काफी वर्षों में शहरी निकाय में
भाजपा का ही परचम लहराया है जबकि प्रदेश ने
इनकी सरकार नहीं थी। इन
चुनावों को इस तथ्य से भी जोड़कर देखना चाहिए।

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