रविवार, 26 नवंबर 2017

कुछ अनकही

"जग जाओ न अब। आधे घंटे से तुम्हारी खर्राटे सुन रही हूँ।" प्रिया ने ईयरफोन की माइक ठीक की और नींद से भारी पलकों को खोल मोबाइल में समय देखा। सुबह के आठ बज रहे थे।
"उठ जायँगे बाबू , अभी तो सोये हैं, " अलसाई सांसो से भरी खामोशी की एक अंतरा के बाद विकास ने कहा ।
" प्लीज जग जाओ , ट्रैन हैं दस बजे से। " प्रिया ने हठ किया।
मगर इस से बेअसर विकास शोख हुआ ,"जग जाएंगे, अगर तुम प्रोमिस करो यहाँ से जगाओगी तो अपने पहलू में सुलाओगी?
उसकी उन्नीन्दी सांसे प्रिया के रगों में सिहरन उलीच रही थी। पर उसने बनावटी गुस्से में कहा
"बस करो मुझे पता है तुम पहलू से निकलोगे तो कहाँ कहाँ बहकोगे ?
"अरे आपकी जवानी , महुए का पानी। हम कैसे न इधर उधर बहकें," विकास आसानी से मानने वालों में से नही था।
"ठीक है फिर तुम देखो कैसे महुए की पानी ,नीम की पानी बनती है। टिकट कैंसिल कर रहे हैं तुम्हारा अकेले आना" , प्रिया ने फोन रख दिया , सच में देर हो रहा था।
फोन कटने के साथ विकास ने घड़ी देखा साढ़े आठ बजे गए थे। वो टॉवल लिए बाथरूम भागा।
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कॉलेज जब शुरू हुआ था तो सीधी साधी मूरत लगती थी प्रिया। ठहर ठहर के बोलना और खुद में खोई रहना ही उसका शगल था। ऐसा लगता था एक सन्नाटा गुजरा है उससे होकर और वो उससे उबर नही पाई हो। पर कॉलेज में आने पे इस शून्यता और सन्नाटे की बर्फ़ पे जाने अनजाने कोई ताजे पानी की फुहारें मारने लगा था। माइनस सोलह डिग्री सेल्सियस जीरो डिग्री सेल्सियस की गर्मी से पिघलने लगा था।
क्लास में जब वो बैठती तो पीछे के बेंच से एक झीनी सी छन की आवाज आती और उसकी आँखें खुद ब खुद उधर खींची चली जाती। एक लड़का बैठता था , अंत की पंक्तियों में, कसी पैंट और कमर के नीचे शर्टिंग हुई शर्ट पहने। उसकी कलाई में मोटे चेन की घड़ी और ब्रेसलेट थी।अक्सर लिखते लिखते जब वो थकता तो हाथों को जुम्बिश देता फिर ब्रेसलेट और घड़ी आपस मे छन की आवाज से आवाज से टकराते। आहिस्ते आहिस्ते यह आवाज उसकी कमजोरी बनती चली गई। छन की आवाज पे मुड़ जाना एक अनकही रीत बन गई उसकी।
बदस्तूर दिन महीने बीत के साल होते गए। वो लिख के थकता रहा , कलाई हिलती रही छन्न की आवाज आती रही वो मुड़ती रही मगर उससे आगे कुछ न हुआ।
न वो पहल करता न ये राब्ते की कोशिश। शायद दोनों को ज्ञात था कि मिलना उनकी नियति है। इसलिए वो चुप थे , कोई जल्दबाजी नही था।
समय आया , वो मिल भी गए और रफ्ता रफ्ता आहिस्ते आहिस्ते और घुलते गए एक दूसरे के रगों में । ये मिलन प्राकृतिक था मानवीयता रत्ती भर नही था इसमें । न कोई बनावटीपन।
प्रिया ने एक बार पूछा भी था क्या तुम मुझे कभी ऐसे इजहार (प्रपोज) नही करोगे? जैसे और लोग करते हैं? जैसे फिल्मों में करते हैं?
तब उसने कहा था अगर हिंदी में मुझे ," तुमसे प्यार है,
इंग्लिश में I LOVE YOU
और फ्रेंच में je a'time
कह देना ही प्रपोज है तब तो कतई नही। इजहार आंखों से झलकना चाहिए और लहजे से गुज़र दिल में उतरते चले जाना चाहिए।
वो चुप हो गई , उसकी गहरी बातें अक्सर चुप कर देने वाली होती थी।
उसका एक ही सिफत था , फ़क़त इश्क़ , फ़क़त इश्क़, फ़क़त इश्क़ , सिवाय इसके कुछ भी नही
वो जो भी कहता वो इश्क़ था, जो भी करता वो इश्क़ था। उसके सामने आते वो ऐसे लगती जैसे नवरात्रि में उड़हुल फूल; साधारण पर , सबसे ख़ास ,सबसे विशिष्ट , सबसे जुदा, सबसे अलहदा।
वो समझ नही पाती उसे महसूस कर के वो क्या हो जाती। यूँ लगता जैसे वो हवा में उड़ती हल्की फुल्की सोनचिरैया हो जो बस नभ में विचरते जा रही हो पंख फैलाये।
बचपन से ही उसकी माँ नही थी। उदास , खोए खोए रहना उसके जिंदगी की रवायत हो गई थी मग़र विकास ने सब बदल दिया था। जिंदगी प्रेम के नाज़ुक सुरों में गूँथ दी थी उसने।
वो उससे प्रेम करता और उसे आह्लादित कर देता। प्रिया के पास देने के लिए कुछ नही बचता। वो चुप बस उसे निहारते रहती । कितना मजबूत और खुशमिजाज था वो
कभी कभार साथ घूमते वक्त जब वो अपना हाथ उसके कंधे पे रखता तो ऐसा लगते मानो वक्त ने सिमट के उसके कंधे पे ठौर ले लिया हो। उसके प्रेम में वैराग्य था। जिस्म नगण्य था रूह प्रधान थी।। इतना मुहब्बत पाकर वो डर जाती उसे कभी इतना प्रेम अपने जीवन मे नही देखा था ।
अगले तीन साल ऐसे बीते की कभी महसूस ही नही हुआ साल में 365 दिन होते हैं।
उसके संगत में वो कब सीधी साधी मूरत से बातूनी चंचल मशीन होती चली गई पता ही नही चला।
पढ़ाई ख़त्म हो गई अब जॉब की बारी थी। उसे जॉब नही करना था।
विकास का कैम्पस प्लेसमेंट हो गया था।
कॉलेज से जाने में तीन दिन बचे थे । वो प्रिया से मिलने आया । बातें होने लगी प्रिया ने पूछा
अब बताओ अपने फ्यूचर का क्या होगा ? शादी करोगे मुझसे?
वो बस मुस्कराया फिर छेड़ते हुए बोला ,"नही ,बिना शादी किये दर्जन भर बच्चे होने का कोई तरीका हो तो बताओ वहीं करेंगे ।
"धत पागल" प्रिया ने हंसकर उसे मुक्का मार दिया। दोनो हंसने लगे।
उसने बताया कि वो पापा से बात करेगा।
और अपने होस्टल चला गया प्रिया बाहर रहती थी वो अपने फ्लैट चली आई।
रात के दस बजे प्रिया ने कॉल किया तो उसका फ़ोन व्यस्त जा रहा था । ग्यारह बजे भी व्यस्त , बारह बजे भी व्यस्त । थक हार कर उसने उसके माँ के फ़ोन लगाया वो भी व्यस्त थी। । प्रिया समझ गई । उसने फोन करना बंद कर दिया साढ़े बारह के आसपास उसने कॉल किया। बेहद थका और ऊबा लग रहा था। किसी अनजान डर से डरके प्रिया ने बिना देर किए उसे अपने पास बुला लिया।
8 घण्टे पहले जिसके पासभर होने से वो खुद को महफूज समझती थी अभी बेबस कटे हुए पेड़ की तरह लग रहा था ।
मिलते ही वो उससे लिपट के सिसकने लगा ," प्रिया हम भागकर शादी कर लेंगे। कास्ट का कोई मतलब नही होता ,एकाध साल बाद मम्मी पापा मान जाएंगे।
प्रिया ने उसे खुद से भींच लिया। वो बच्चे की तरह सिमटता चला गया। औरत की खासियत होती है , माँ बनने के लिए उसे बच्चे और उम्र की आवश्यकता नही होती है। बस परिस्थितियाँ होनी चाहिए वो अपने पिता की भी माँ बन सकती है। और प्रिया तो माँ के जाने के बाद से ही अपने टूटे हुए पापा की माँ बन गई थी।
आज भी वो माँ बन गई अपने प्रेमकी और वो बच्चों की तरह लिपट के उससे रोता रहा और वो उसके बालों को सहलाती रही उसे जिंदगी की हकीकत समझाती रही। माँ बाप की अहमियत बताती रही। वो जानती थी माँ के होने के मायने क्या हैं।
उसने खुद से शादी को मना कर दिया। वो जिद करता रहा वो उसे निष्ठुरता से ऐसे समझाती रही जैसे उनका इश्क़ कभी शादी के लिए बना ही न हो।
सुबह हो गई दोनो सो गए। प्रिया ने उसे सहज कर दिया। कल होके उन्हें घर निकलना था । दोपहर को वो होस्टल चला आया ।पूरी पैकिंग बाकी थी। रात भर पैकिंग करता रहा सुबह 4 बजे सोया मगर आठ बजे उसका फ़ोन आगया स्टेशन आने के लिए। उसका जगने का मूड नही था पर प्रिया की बातें वो काट नही सकता था।
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दस बजने में दस मिनट बाकी थे वो भागते हुए प्लेटफार्म आया । वो बोगी के बाहर खड़े उसका इंतिजार कर रही थी । दोनो साथ बैठ गए। रास्ते भर बीते कल की बात होती रही। वो आगे के बारे में कुछ सुनना नही चाहता था और वो सुनाना नही चाहती थी। बारह घण्टे के सफर में दोनों पुरानी यादों को जिंदा करते रहे। वो चाहता था एक और कोशिश करना मगर प्रिया ने साफ मना कर दिया। अगली सुबह दोनों गंतव्य पे आ गये थे। स्टेशन से उतरते वक्त प्रिया ने अपना अपना पैंडेंट उतारकर उसके गले में डाल दिया। उसने भी अपना ब्रेसलेट खोल कर उसके हाथों में डाल दिया। प्रिया चाहती थी एक बार उसके बाहों में जकड़ जाए । वो जकड़ भी जाती स्टेशन पर खड़े तमाम लोगों की परवाह किये बगैर , पर उनलोगों में उसके पापा भी थे। वो चुपचाप बाहर खड़े कार में आकर बैठ गई।
रात के दस बज रहे थे रेडियो पे RJ साएमा ने पुरानी जीन्स में लता मंगेशकर का गाना लगाया हुआ था......"हम भूल गए रे हर बात मगर तेरा प्यार नही भूले" वो धुआँ धुआँ होने लगी। पापा सवाल पे सवाल पूछ जा रहे थे वो बस हूँ हाँ किये जा रही थी।
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दोस्त को आने का मैसेज कर विकास वहीं स्टेशन के खाली पड़े बेंच पे बैठ गया था।
कुछ देर में दोस्त आ गया। विकास ने चलते वक्त अपने कलाई से घड़ी गिरा दी। शोर में शायद छन की आवाज दब गई या इसबार घड़ी बेमतलब की छन करना नही चाहती थी।

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

गौरवगाथा

वियतनाम विश्व का एक छोटा सा देश है जिसने..... अमेरिका जैसे बड़े बलशाली देश को झुका दिया।
लगभग बीस वर्षों तक
चले युद्ध में अमेरिका पराजित हुआ था अमेरिका पर विजय के बाद वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष से एक पत्रकार ने एक सवाल पूछा.....
जाहिर सी बात है कि सवाल यही होगा कि आप युद्ध कैसे जीते या अमेरिका को कैसे झुका दिया ??
पर उस प्रश्न का दिए गए उत्तर को सुनकर आप हैरान रह जायेंगे और आपका सीना भी गर्व से भर जायेगा।
दिया गया उत्तर पढ़िये।
सभी देशों में सबसे शक्ति शाली देश अमेरिका को हराने के लिए मैंने एक महान व् श्रेष्ठ भारतीय राजा का चरित्र पढ़ा।
और उस जीवनी से मिली प्रेरणा व युद्धनीति का प्रयोग कर हमने सरलता से विजय प्राप्त की।
आगे पत्रकार ने पूछा...
"कौन थे वो महान राजा ?"
मित्रों जब मैंने पढ़ा तब से जैसे मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया आपका भी सीना गर्व से भर जायेगा।
वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष ने
खड़े होकर जवाब दिया...
"वो थे भारत के राजस्थान में मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप सिंह !!"
महाराणा प्रताप का नाम
लेते समय उनकी आँखों में एक वीरता भरी चमक थी। आगे उन्होंने कहा...
"अगर ऐसे राजा ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने सारे विश्व पर राज किया होता।"
कुछ वर्षों के बाद उस राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु हुई तो जानिए उसने अपनी समाधि पर क्या लिखवाया...
"यह महाराणा प्रताप के एक शिष्य की समाधि है !!"
कालांतर में वियतनाम के
विदेशमंत्री भारत के दौरे पर आए थे। पूर्व नियोजित कार्य क्रमानुसार उन्हें पहले लाल किला व बाद में गांधीजी की समाधि दिखलाई गई।
ये सब दिखलाते हुए उन्होंने पूछा " मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप की समाधि कहाँ है ?"
तब भारत सरकार के अधिकारी चकित रह गए, और उनहोंने वहाँ उदयपुर
का उल्लेख किया। वियतनाम के विदेशमंत्री उदयपुर गये, वहाँ उनहोंने महाराणा प्रताप की समाधि के दर्शन किये।
समाधी के दर्शन करने के बाद उन्होंने समाधि के पास की मिट्टी उठाई और उसे अपने बैग में भर लिया इस पर पत्रकार ने मिट्टी रखने का कारण पूछा !!
उन विदेशमंत्री महोदय ने कहा "ये मिट्टी शूरवीरों की है।
इस मिट्टी में एक महान् राजा ने जन्म लिया ये मिट्टी मैं अपने देश की मिट्टी में
मिला दूंगा ..."
"ताकि मेरे देश में भी ऐसे ही वीर पैदा हो। मेरा यह राजा केवल भारत का गर्व न होकर सम्पूर्ण विश्व का गर्व होना चाहिए।"

वे 90 के दशक

90 के दशक को याद करता हूँ तो सबसे पहली यादों में "तुझे न देखूं तो चैन मुझे आता नहीं है" वाला गाना आता है..और "ऐसी दीवानगी देखी नहीं कभी" पर मेज को ढोलक की तरह बजाना याद आता है..माता के जागरण में कांगो बजाने वाले को मैं बड़े कौतूहल से देखता था..
उन दिनों दोपहर बहुत लम्बी हुआ करती थीं..तब नींद भी दिन में कहाँ आती थीं..दांत टूट गया था...सीटी बजाना अपने आप आ गया था..गाने भी तब सिर्फ किसी कैसेट की दुकान के सामने से निकलते ही सुनने को मिलते थे..
बैटरी से मोहल्ले में किसी के घर फिल्म देखते हुए..सफ़ेद घोड़े और काले घोड़े की दौड़ के सीन पर हीरो और विलेन के बाद सबसे ज्यादा ध्यान रहता था...मैं रेसिस्ट नहीं हूँ पर उस वक़्त मैं हमेशा सफ़ेद घोडा ही चुनता था..कभी कभी चौपाल पर रागिणी गायकी का कम्पटीशन होता था..या किसी के यहाँ शादी होने पर रौशनी के लिए जो जेनरेटर चलाया जाता था..वो मुझे बड़ा सुकून देता था..जेनरेटर की आवाज और लोगों की चहल पहल मुझे रोज रात को लगने वाले डर से आजाद कर देती थीं..मैं और मेरे दोस्त दावत से ज्यादा जनरेटर के आस पास ही पाये जाते थे..कभी उसमे से चिंगारी निकलते देख खुश होते..कभी उसके बंद होने पर भाग के पानी भर भर के लाते..
इस बहाने हम सब दोस्तों की टोलियों को रात में अँधेरी गलियों में दौड़ लगाने की हिम्मत भी मिल जाती थीं..

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

बदचलन और बदनसीब लड़की(छोटी सी कहानी)

"तलाक तलाक तलाक "जैसे ही रिया के कानों में पिघले सीसे की तरह बिगड़ैल नबाब साहब के ये शब्द पड़े।दिल मे हूक सी उठी आँखों के आगे अंधेरा छा गया।वो दोनों हाथों से सर पकड़कर धम्म से उस आलीशान सोफे पे गिर पड़ी।आँसुओ के बहते आवेग में उसे पुरानी बातें याद आने लगीं।
बनारस के ब्राह्मण खानदान में बचपन से ही अद्वितीय सुंदर एकलौती बेटी रिया को सबसे ज्यादा प्यार उसके पुजारी पापा करते थे।छोटी थी तो कंधे पे बिठाकर बनारस की घाटों पर शाम में घूमते हुए लोगों से कहते कि "देखना एक दिन ये मेरा और मेरे कुल का नाम रोशन करेगी”।
उम्र बढ़ी तो सुंदरता और जवानी और निखरी।रिया के तीखे नयन हिरनी सी कमर गोरा और गदराए जिस्म पे एक छोटी मोटी मूवी बनाने वाले डायरेक्टर की नज़र पड़ी तो उसने अपनी मूवी में एक छोटा सा रोल और मॉडलिंग के लिए आफर दे दिया और रिया ने भी हीरोइन बनने का सपने संजो रखे थे।
मॉडलिंग और मूवी में रिया के काम करने को लेकर घर पे खूब कोहराम मचा ,रोना धोना जम के हुआ आखिर में रिया के जिद की जीत हुई।ग्लैमर और पैसे का लालच बुद्धि और इज़्ज़त पे भारी पड़ गया और रिया अपने परिवार के अरमानों को रौंदते हुए मुम्बई चल दी अपने सपनों को पूरा करने।
कुछ दिनों तक मुम्बई के एक परिचित रिश्तेदार के यहाँ रहकर एक्टिंग की ट्रेनिंग लेते हुए मॉडलिंग की फिर उसने वो छोटा रोल बखूबी निभाया लेकिन ग्लैमर की दुनिया का काला सच यह भी है कि इस दुनिया में सफलता पाने के लिए टैलेंट के अलावा या तो कोई गॉडफादर चाहिए या फिर इज़्ज़त का सौदा करना पड़ता है।
जब बहुत स्ट्रगल करने के बाद भी काम न मिला तो आखिर में रिया को कॉम्प्रमाइज़ करना पड़ा।अपनी सुंदरता और शरीर का इस्तेमाल कर वह काम पाने में कामयाब हुई और बहुत तेजी और आसानी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगी।
यही उसकी मुलाकात एक खानदानी बहुत पैसे वाले पैतालीस वर्षीय बिगडैल नवाब से हुई जो अपने ब्लैक मनी को फिल्मों में फाइनेंस करता था।अब रिया के लिए नैतिकता और पिता की सिखाई अच्छी बातों का कोई मोल न था शराब ड्रग्स जिस्मफरोशी सब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे।परिवारवालो के संबंध
रिया से लगभग ख़त्म हो चुके थे।
अंत में रिया उस मोटे पैसे वाले नवाब को अपने हुस्न के जाल में फसाने में कामयाब हो गयी।नवाब ने भी पहली बीवी को तलाक देकर बहुत शानो शौकत के साथ रिया से निकाह किया इस निकाह में शहर बड़े बड़े लोगों ने शिरकत की।खूब शानदार दावत और मेहमाननवाज़ी हुई ,पत्रकार मीडिया सब ने इस शाही शादी के सम्मान में कसीदे पढ़े।लजीज वयंजनो की महक वऔर लाइटो से पूरा महल जगमगा उठा,पर दूर बनारस में पंडितजी ने शर्मिदगी सेे घर में घनघोर अंधेरा कर रखा था।रिया के परिवार से कोई उस शादी में न गया था।पर रिया को इस बात का कोई मलाल न था।वो नकली ग्लैमर सफलता और पैसे के नशे में चूर थी।उसे अपनों का प्यार याद न था।उधर लोग खूब खुश होकर जमकर मिठाइयाँ और लजीज खाने का आंनद ले रहे थे इधर बनारस में दुल्हन के घर खाना ना बना था।उधर नाच ,गाना संगीतऔर मस्ती थी इधर करुण रुदन और दर्द।
दो सालों तक नवाब थोड़ा रिया के प्रेम में पागल रहा फिर उसकी पहले की तरह आय्याशियाँ शुरु हो गईं।जब रिया को नवाब की किसी और उभरती मॉडल से निकाह की खबर सुनी तो वह गुस्से से पैर पटकती हुई नवाब से बात करने गयी तो उसे "तलाक तलाक तलाक 'शब्द सुनने को मिले।जिस पैसे शानों शौकत और रुतबे के लिए उसने नवाब से शादी की थी वो उसके हाथ से फिसलती नज़र आई।
नवाब चिल्ला रहा था "जा बदचलन लड़की तलाक के बाद अब तेरी इस महल में कोई जगह नही।"रिया नीचे जाने के बजाए महल के छत पर गयी।उसे पापा के साथ बनारस में कंधे पर घूमना और परिवार का प्यार याद आ रहा था।'पापा मैं आपका नाम रोशन न कर सकी माफ कीजियेगा" बुदबुदाते हुए छत से कूद गई।
अगले दिन समाचार पत्रों में रिया की छत से पैर फिसलने से गिरकर मौत की खबर छपी थी ।अफसोस उस बदनसीब लड़की की मौत पे रोने वाला कोई न था इधर नवाब साहब फिर से नए निकाह के लिए तैयारी में
जुट गए....

रानी पद्मिनी पर बुद्धिजीवियों से कुछ सवाल

ये विषय महज एक फिल्म तक सीमित नहीं है . ये विषय एक मौक़ा है इतिहास से उन पलों को खोज निकालने का जो आगे भविष्य में कई स्थानों पर उठ कर फिर खड़े हो सकते हैं . कश्मीर और पाकिस्तान जैसी तमाम जगहों पर तो खड़े भी हो चुके हैं . अब समय है इसी मौके पर ये भी जान लेने का कि दुर्दांत आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी के आने पर जो चित्तौड़ में हुआ वो अब तक किसी अन्य नरेश और सम्राट आदि के आने पर क्यों नहीं हुआ था ?
युद्ध और शांति आदि इतिहास में दोनों साथ साथ चले हैं . अक्सर एक नरेश दूसरे नरेश को हरा कर उसके राज्य को अपनी सीमाओं में मिला लिया करता था लेकिन जो वीभत्स रूप क्रूर आक्रांता के कारण चित्तौड़ का हुआ वो संसार में अद्वितीय क्यों है ? अलाउद्दीन खिलज़ी को वो शिक्षा किस ने दी या कहाँ से मिली थी जो ना सिर्फ महारानी पद्मावती अपितु उनके राज्य की हर नारी ने खुद को आग में स्वाहा कर लिया…
यकीनन ये ऐसा सवाल है जो इतिहास को तोड़ कर लिखने वालों के साथ टी वी पर बैठ कर लच्छेदार बातें करने वालो के हर रसीले जवाब को एक पल में ध्वस्त कर देता है . जौहर का अर्थ होता है खुद को स्वाहा कर देना और ये किसी भी स्वाभिमानी नारी का अंतिम चरण होता है . संसार जानना चाहता है क्रूरता की उस अंतिम पराकाष्टा और नीचता के उस अंतिम बिंदु को जो अलाउद्दीन ही नहीं तमाम आक्रन्ता ले कर साथ आये थे और जिसके शिकार हिन्दू हुए हैं कई हजार सालों से और जो अब तक जारी है अनवरत उसी हालत में . कितने मज़हबी ठेकेदारों में ये दम है जो अलाउद्दीन के आक्रमण के पीछे छिपी उस सोच को खुल कर चैनल पर आ कर बता सकते हैं जो ना सिर्फ रानी पद्मावती अपितु उस राज्य की हर नारी को खुद को स्वाहा करने के लिए आतुर कर देता है ..
संसार आतंक के उस अंतिम स्तर की सोच को इसी समय जानना चाहता है . यकीनन सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का विरोध , डी जी वंजारा का विरोध आदि करने वालों के मुँह से कभी भी अलाउद्दीन का विरोध न सुनने के बाद ये जरूर जाहिर होता है कि कई अभी भी उस जल्लाद की विचारधारा से सहमत होंगे और उनकी ये सहमति कब कोई नया अलाउद्दीन बना कर ला देगी ये कहा नहीं जा सकता .. इन नए अलाउद्दीन के आगे अब हिन्दू समाज कोई नई पद्मवती स्वाहा करने के लिए कतई तैयार नहीं है इसलिए अब समय है कि समाज में छिपे उन सभी अलाउद्दीन की पहिचान हो जाए क्योकि बेटी बचाओ अभियान के तहत ये कार्य सबसे ज्यादा जरूरी होता है . बेटियों को गर्भ में मार देने वाले तमाम डॉक्टर यकीनन घृणा के पात्र हैं जो जेलों में चक्की पीस रहे हैं पर बेटियों , माताओ और बहनो को जिन्दा जल जाने पर मजबूर कर देने वाले जल्लाद को किताबों में पढ़ाया जाना और उसके कई समर्थक होना इस देश का दुर्भाग्य क्यों न माना जाय 

सोमवार, 20 नवंबर 2017

यादें बचपन की

और शाम को अँधेरा होने तक
खेलते रहना क्रिकेट..
उतना अँधेरा जब गेंद दिखे या न दिखे
लेकिन उसके सिर्फ टप्पे की आवाज सुनाई दे..
घुटनो तक मिटटी में सने,
पूरी शर्ट पसीने में भीगी हुई, हाथो पर जमे मैल से बेपरवाह मैदान से वापस घर आते हुए
घर में घुसना दबे पाँव..
मुंह हाथ धो के
राजा बेटा बन के बैठ जाना पढ़ने
तब तक
जब तक पापा का डायलॉग न ख़त्म हो जाए
और माँ खाने के लिए आवाज न दे दे.

नये देशों का सृजन

हाल ही में तीन नए देशों का सृजन हुआ है।

ईस्ट तिमोर,

दक्षिणी सूडान

और

कोसोवो।

क्या हम अधिकांश भारतीयों को यह पता है इन देशों का निर्माण किस आधार पर हुआ है?

जिन्हें नहीं पता है उनके लिए जानकारी है कि इन देशों का निर्माण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण हुआ है।

ईस्ट तिमोर

जो इंडोनेशिया का एक भाग था में पहले ईसाइयों की आबादी बहुत कम थी, मुसलमानों एवं अन्य मत के मानने वाले लोगों की आबादी 80% से अधिक थी केवल 50 वर्षों में ईसाई मिशनरियों के प्रयत्न से ईस्ट तिमोर में ईसाइयों की जनसंख्या 80% से अधिक हो गई, परिणाम स्वरुप संयुक्त राष्ट्र के दखल से जनमत संग्रह करा कर ईस्ट तिमोर नाम के देश का निर्माण कर दिया गया। कोई युद्ध नहीं हुआ।

दक्षिणी सूडान

सूडान के दक्षिणी क्षेत्र में गरीबी थी,

मिशनरियों के प्रभाव में कुछ आदिवासी लोगों को पहले ही ईसाई बनाया गया।

धीरे धीरे इस मुस्लिम बहुल देश को दक्षिणी क्षेत्र में ईसाइयों से भर दिया गया।

फिर गृह युद्ध करा दिया गया। शांति प्रयास संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में हुए और परिणिति दक्षिणी सूडान को काटकर ईसाई देश के रूप में नए देश की मान्यता दे दी गई।

कोसोवो

सर्बिया के भीतर एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें खदानें बहुत अधिक थीं। इन खदानों में काम करने के लिए अल्बानियाई मूल के मुसलमानों को मजदूर के रूप में लाया गया था।कालांतर में इनकी संख्या बढ़ गई। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद सर्बिया स्वतंत्र देश बना। लेकिन मुसलमानों ने सर्बों के अधीन रहना स्वीकार नहीं किया और कोसोवो को अलग देश बनाने की मांग किया। गृहयुद्ध जैसी स्थिति कई वर्षों तक रही। फिर नया देश बन गया।

प्रश्न उठता है कि इस नए बने देश से हमारा क्या संबंध ?

मित्रों

भारत के कई क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जनसांख्यकीय परिवर्तन किए जा रहे हैं।

हालाँकि बहुसंख्यक आबादी इससे अनजान है।

विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों मे ऐसा होने से गैरकानूनी एवं आतंकी गतिविधियां बढ़ रही हैं।

यदि हम भारत की अखंडता बनाए रखना चाहते हैं तो स्थानीय प्रशासन से मिलकर हमें समस्या का समाधान खोजना चाहिए। आखिर हम भी तो भारत

किस्से या हकीकत

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कितना अपना लगता है, योगी। ऐसे जैसे , हम में से ही कोई उठकर सिनेमा में घुस गया हो। बेतरतीब कपड़ें , बिखरें बाल, लच्छे दार मगर सच्ची बातें। अदा को अंदाज बनाता।
जो दिख जाए वहीं बोलने के आदी होना और सीधी-साधी जिंदगी जीते जीते फ़सादी लगने लगना। कभी कभार जिंदगी से दब जाने के बावजूद आंखों में आगे न दबने की कसक रखना।
बिजनेस क्लास में बैठने के वितीय अभिमान को "टाँग पसार के बैठेंगे " कहकर हल्का कर देना। अपने नजरिये का सच दूसरों को भी दिखाना। दूसरे के सच से इतिफाक न रखना।
जिस से करना , जब भी करना......टूट के मोहब्बत करना । उसकी गीतें सुनना, अपनी बातें बताना। रूह से रूह जोड़ लेना। खाली वक्त में बस इश्क़ सोचना। और फिर एक दिन बेवजह सबकुछ छोड़ के वापस मुड़ जाना। बिना इस बात के फिक्र के सामने वाला पे क्या गुजरी होगी?
सबकुछ भूला देना फिर एक दिन उसकी याद आने पे कुशन में आंखे देकर रो देना । तब, सोचना की वो भी मेरे लिए ऐसे ही रोई होगी।
दर्द में होकर भी प्रेम के अधूरेपन को जज्ब न करने का जज्बा रखना और किसी का हाथ अपने कमर पे पाकर फिर से प्यार को बढ़ जाना। इस बार भी घनघोर करना ।आकंठ डूब जाना। पुरानी यादों को दोहराना और दुहराते दुहराते एक दिन फिर से ऊब जाना और एक दफा फिर से सबकुछ छोड़ देना।
अधूरेपन की कसक का अब आदत बन जाना मग़र नई लड़की से सब बढ़िया करने की कोशिश में करना और इन्हीं कोशिशों में फिर से ऊब जाना ..... या यूं कहिये की जिंदगी के मार्फ़त ऊबा दिया जाना।
मुहब्बत , आशिकी, इश्क़ ,प्रेम ..... सब कुछ शब्दों का फरेब लगना मगर फरेब में फंसने को नियति मान लेना।
नई लड़कियों से दिल बहलाते बहलाते......फिर से किन्ही ख़ास आंखों के काजल में अटक जाना। फिर इश्क़ करना। इस दफा , अलहदा करने, अपने ढंग से करना। अल्हड़ हो जाना । और फिर सामने वाले के इश्क़ का खेल हो जाना । खुद मोहरें बन पिटते जाना। जिस अना, अहम, से गिरेबाँ ऊंची रहती हो.......उनको बिखरते देखते रहना। सब कुछ अपने हाथों में होने के बावजूद , दिल के इशारों का बाट जोहना। किश्तों में टूटना।
मगर इन सब बातों के बावजूद योगी बने रहना ,पुरानी बेतरतीबी से वास्ता रखना, गला बेलौस और किरदार ठंडा रखना , अधूरे शायर को जिंदा रखने और
फिर ख़ालीपने के दौर में शारिक कैफ़ी को सोचना ....
निगाहें नीचीं हुई हैं मेरी
ये टूटने को घड़ी है मेरी
ये काम दोनो तरफ हुआ है
उसे भी आदत पड़ी है मेरी।
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एक बार तो जरूर देखिए "करीब करीब सिंगल" अगर आपकी जिंदगी में भी किस्से हो, कांड हो। रणविजय भैया (इरफ़ान खान) फेवरेट हैं, इसलिए देखने को नही कर रहे है...वो लड़की अच्छी लगी है जो बस काज़ल लगाकर जान लेती है..... एक ऐसी लड़की की तरह। ।
जिसको कहदो ,तुम ड्रीम गर्ल हो तो वो कहे......बस सपनों में।

रविवार, 19 नवंबर 2017

pdmawati

कहते हैं जब नादिर शाह ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया था, तो जामा मस्जिद के ऊपर चढ़कर एक तलवार छत पर गाड़ दी थी और अपने जिहादियों को हुक्म दिया था कि जब तक ये तलवार ना उठे, क़त्ल-ए-आम ना रुके..और रुका भी नहीं !
अहमद शाह अब्दाली जब लाहौर से निकला, तो ये हुक्म दिया कि वापस आऊं तो शहर के चारों तरफ नरमुंड का सैलाब हो..और यह हुआ भी!
इनको सिर्फ लुटेरा बताकर इतिहास ख़त्म कर देने वाले वामी दोगले जब औरंगजेब को माननीय बताने लगते हैं, तो हैरानी कैसी ?
ये तो इनके नायक हैं..
दिल्ली में एक लाख लोगों को काटने वाला तैमूर हो या राजपूतों के खून का प्यासा अल्लाउद्दीन खिलजी..
ये सब इनके नायक हैं! तारिक-बिन-जियाद से लेकर ओसामा बिन लादेन तक सब माननीय हैं..
किसको फर्क पड़ता है कि गुरु तेग बहादुर के साथ क्या हुआ ?
या संभाजी के साथ क्या हुआ..?
सहिष्णुता सिखाता है ना हिंदुत्व.. तो ये सब स्वीकार करो! अपने पूर्वजों के कातिलों को अपना भगवान स्वीकार करो और तब तक करो जब तक कि स्वयं ख़त्म ना हो जाओ !!
तुम्हारे पास गंधार नहीं रहा, लाहौर नहीं रहा, सिंध, ननकाना साहिब, हिंगलाज भी नहीं रहा..
और तुम्हारा वहम हट जाए तो जानोगे कि कश्मीर, बंगाल और केरल भी लगभग छिन ही चुके हैं। मगर जाने दो, कौन बेवकूफ सोचे..
टी.वी. खोलो रे.. तैमूर की अम्मी की फिल्म आ रही है..!!
जहां एक ओर महारानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा सुनकर मन आनन्द विभोर हो गया कि लाख विपरीत परिस्थितियों से घिरे होने के बाद भी अपने गौरव और मान सम्मान को आंच नहीं आने दी और अंततः प्राण आहूति दी । महारानी लक्ष्मीबाई इतिहास में अमर हुई , उनका नाम देश के बच्चे बच्चे के मुंह पर आया और हर भारतवासी की प्रेरणास्रोत बनी ।
वहीं दूसरी ओर महारानी के दत्तक पुत्र के जीवन की दुश्वारियों पर मन द्रवित हो उठा जिसका पीछा दुर्भाग्य ने आजीवन न छोड़ा । दर दर भटकते रहे फिर भी किसी ने सहायता न की और जिन्होंने सहायता की तो स्वार्थ प्रबलता के साथ की ।
देश मे मक्कारों का वृहद अनुपात आज से ही नहीं पहले भी था । महारानी लक्ष्मीबाई का भी साथ बहुत से राजाओं ने न दिया । वास्तव में जितना हमे अपनों ने मारा है उतना गैरों ने नहीं मारा और वही इतिहास आज भी दोहराया जा रहा है ।
#गावके_झरोखे_से
सवेरे सवेरे महिला निकल ली है खिलहान की ओर सिर पर तिरपाल-बोरी-दउरी लिए। धान सटकाया जायेगा वहाँ।
तिरपाल में इकट्ठा किया जायेगा और अन्न और आधा आधा बांट कर अपना हिस्सा बोरियों  में भर क्र घर लौटेगी संझा को।

इससे साल भर के चावल का इंतजाम हो जायेगा

बस इतनी सी थी ये कहानी मेरे छोटे से गांव की आगे भी जारी रहेगी ;
राजा रत्न सिंह थे ,
चित्तौड़ था ...
अलाउद्दीन खिलजी था......
चित्तौड़ पर हमला हुआ था.......
बस पद्मावती काल्पनिक थी....
हद है दोगलेपन की.....