सोमवार, 20 नवंबर 2017

किस्से या हकीकत

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कितना अपना लगता है, योगी। ऐसे जैसे , हम में से ही कोई उठकर सिनेमा में घुस गया हो। बेतरतीब कपड़ें , बिखरें बाल, लच्छे दार मगर सच्ची बातें। अदा को अंदाज बनाता।
जो दिख जाए वहीं बोलने के आदी होना और सीधी-साधी जिंदगी जीते जीते फ़सादी लगने लगना। कभी कभार जिंदगी से दब जाने के बावजूद आंखों में आगे न दबने की कसक रखना।
बिजनेस क्लास में बैठने के वितीय अभिमान को "टाँग पसार के बैठेंगे " कहकर हल्का कर देना। अपने नजरिये का सच दूसरों को भी दिखाना। दूसरे के सच से इतिफाक न रखना।
जिस से करना , जब भी करना......टूट के मोहब्बत करना । उसकी गीतें सुनना, अपनी बातें बताना। रूह से रूह जोड़ लेना। खाली वक्त में बस इश्क़ सोचना। और फिर एक दिन बेवजह सबकुछ छोड़ के वापस मुड़ जाना। बिना इस बात के फिक्र के सामने वाला पे क्या गुजरी होगी?
सबकुछ भूला देना फिर एक दिन उसकी याद आने पे कुशन में आंखे देकर रो देना । तब, सोचना की वो भी मेरे लिए ऐसे ही रोई होगी।
दर्द में होकर भी प्रेम के अधूरेपन को जज्ब न करने का जज्बा रखना और किसी का हाथ अपने कमर पे पाकर फिर से प्यार को बढ़ जाना। इस बार भी घनघोर करना ।आकंठ डूब जाना। पुरानी यादों को दोहराना और दुहराते दुहराते एक दिन फिर से ऊब जाना और एक दफा फिर से सबकुछ छोड़ देना।
अधूरेपन की कसक का अब आदत बन जाना मग़र नई लड़की से सब बढ़िया करने की कोशिश में करना और इन्हीं कोशिशों में फिर से ऊब जाना ..... या यूं कहिये की जिंदगी के मार्फ़त ऊबा दिया जाना।
मुहब्बत , आशिकी, इश्क़ ,प्रेम ..... सब कुछ शब्दों का फरेब लगना मगर फरेब में फंसने को नियति मान लेना।
नई लड़कियों से दिल बहलाते बहलाते......फिर से किन्ही ख़ास आंखों के काजल में अटक जाना। फिर इश्क़ करना। इस दफा , अलहदा करने, अपने ढंग से करना। अल्हड़ हो जाना । और फिर सामने वाले के इश्क़ का खेल हो जाना । खुद मोहरें बन पिटते जाना। जिस अना, अहम, से गिरेबाँ ऊंची रहती हो.......उनको बिखरते देखते रहना। सब कुछ अपने हाथों में होने के बावजूद , दिल के इशारों का बाट जोहना। किश्तों में टूटना।
मगर इन सब बातों के बावजूद योगी बने रहना ,पुरानी बेतरतीबी से वास्ता रखना, गला बेलौस और किरदार ठंडा रखना , अधूरे शायर को जिंदा रखने और
फिर ख़ालीपने के दौर में शारिक कैफ़ी को सोचना ....
निगाहें नीचीं हुई हैं मेरी
ये टूटने को घड़ी है मेरी
ये काम दोनो तरफ हुआ है
उसे भी आदत पड़ी है मेरी।
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एक बार तो जरूर देखिए "करीब करीब सिंगल" अगर आपकी जिंदगी में भी किस्से हो, कांड हो। रणविजय भैया (इरफ़ान खान) फेवरेट हैं, इसलिए देखने को नही कर रहे है...वो लड़की अच्छी लगी है जो बस काज़ल लगाकर जान लेती है..... एक ऐसी लड़की की तरह। ।
जिसको कहदो ,तुम ड्रीम गर्ल हो तो वो कहे......बस सपनों में।

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