शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

वे 90 के दशक

90 के दशक को याद करता हूँ तो सबसे पहली यादों में "तुझे न देखूं तो चैन मुझे आता नहीं है" वाला गाना आता है..और "ऐसी दीवानगी देखी नहीं कभी" पर मेज को ढोलक की तरह बजाना याद आता है..माता के जागरण में कांगो बजाने वाले को मैं बड़े कौतूहल से देखता था..
उन दिनों दोपहर बहुत लम्बी हुआ करती थीं..तब नींद भी दिन में कहाँ आती थीं..दांत टूट गया था...सीटी बजाना अपने आप आ गया था..गाने भी तब सिर्फ किसी कैसेट की दुकान के सामने से निकलते ही सुनने को मिलते थे..
बैटरी से मोहल्ले में किसी के घर फिल्म देखते हुए..सफ़ेद घोड़े और काले घोड़े की दौड़ के सीन पर हीरो और विलेन के बाद सबसे ज्यादा ध्यान रहता था...मैं रेसिस्ट नहीं हूँ पर उस वक़्त मैं हमेशा सफ़ेद घोडा ही चुनता था..कभी कभी चौपाल पर रागिणी गायकी का कम्पटीशन होता था..या किसी के यहाँ शादी होने पर रौशनी के लिए जो जेनरेटर चलाया जाता था..वो मुझे बड़ा सुकून देता था..जेनरेटर की आवाज और लोगों की चहल पहल मुझे रोज रात को लगने वाले डर से आजाद कर देती थीं..मैं और मेरे दोस्त दावत से ज्यादा जनरेटर के आस पास ही पाये जाते थे..कभी उसमे से चिंगारी निकलते देख खुश होते..कभी उसके बंद होने पर भाग के पानी भर भर के लाते..
इस बहाने हम सब दोस्तों की टोलियों को रात में अँधेरी गलियों में दौड़ लगाने की हिम्मत भी मिल जाती थीं..

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