रविवार, 19 नवंबर 2017

जहां एक ओर महारानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा सुनकर मन आनन्द विभोर हो गया कि लाख विपरीत परिस्थितियों से घिरे होने के बाद भी अपने गौरव और मान सम्मान को आंच नहीं आने दी और अंततः प्राण आहूति दी । महारानी लक्ष्मीबाई इतिहास में अमर हुई , उनका नाम देश के बच्चे बच्चे के मुंह पर आया और हर भारतवासी की प्रेरणास्रोत बनी ।
वहीं दूसरी ओर महारानी के दत्तक पुत्र के जीवन की दुश्वारियों पर मन द्रवित हो उठा जिसका पीछा दुर्भाग्य ने आजीवन न छोड़ा । दर दर भटकते रहे फिर भी किसी ने सहायता न की और जिन्होंने सहायता की तो स्वार्थ प्रबलता के साथ की ।
देश मे मक्कारों का वृहद अनुपात आज से ही नहीं पहले भी था । महारानी लक्ष्मीबाई का भी साथ बहुत से राजाओं ने न दिया । वास्तव में जितना हमे अपनों ने मारा है उतना गैरों ने नहीं मारा और वही इतिहास आज भी दोहराया जा रहा है ।

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