सोमवार, 20 नवंबर 2017

यादें बचपन की

और शाम को अँधेरा होने तक
खेलते रहना क्रिकेट..
उतना अँधेरा जब गेंद दिखे या न दिखे
लेकिन उसके सिर्फ टप्पे की आवाज सुनाई दे..
घुटनो तक मिटटी में सने,
पूरी शर्ट पसीने में भीगी हुई, हाथो पर जमे मैल से बेपरवाह मैदान से वापस घर आते हुए
घर में घुसना दबे पाँव..
मुंह हाथ धो के
राजा बेटा बन के बैठ जाना पढ़ने
तब तक
जब तक पापा का डायलॉग न ख़त्म हो जाए
और माँ खाने के लिए आवाज न दे दे.

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