रविवार, 24 दिसंबर 2017

वो क्रिसमस की याद

कुहरे की आँचल धरती के गोद में पसरी हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने ठंडे रुई के फोहे हवा में उड़ा दिए हो। चार साल पहले क्रिसमस के सर्द सुबह में अपने ट्यूशन के स्टैंड से मैं सायकल लॉक करके बाहर निकला। साइकिल चलाने से थोड़ी गर्मी आ गई थी इसलिए कान में लिपटा मफलर अब स्टाइल बनके कांधे पर झूलने लगा था
जब सारा शहर नींद के आगोश में रहता था तब इतनी ठंड में इतनी सुबह ट्यूशन आने की मेरी दो वजहें थीं, एक उनको देख लेना जिन्होंने मेरे दिल का सुकून लूट लिया था और दुसरा उन को दिख जाना जिन्होंने मेरे दिल का सुकून लूट लिया था।
मैथेमेटिक्स अच्छी थी मेरी मगर उसने ही जबरन ट्यूशन आने को कहा था और मुझे आना पड़ा था।
रोज की तरह मुझसे पहले पहुंच कर , वो गेट पे खड़ी थी। ब्लैक जैकेट पे रेड स्टोल डाले। ये स्टोल बहोत प्यारा था ।कभी कभी वो खुश होती तो मेरे गले में फंसाके अपनी नाक मेरे नाक से सटा देती फिर पूछती बताइये मेरे नाक बड़े हैं न आपसे? मैं हाँ कह देता तो कोई बात नही लेकिन ना कह दिया तो कहती ..."आपकी नाक मेरी नाक ....मेरी नाक मेरी नाक। " फिर खुद जोर जोर से हंसते हंसते छुईमुई सी मुझमें सिकुड़ जाती।
कल रात किसी बात पे एक घण्टे तक मैंने उसे डांटा। उसके बाद आधे घण्टे तक रो कर उसने मुझे डेढ़ घण्टे तक डांटा था।
इसलिए हल्की सी तल्खी हो गई थी तो मैं उससे नजरें चुरा के निकलना चाहता था पर वो ऐसे घुर रही थी की मुझे उसकी ओर देखना पड़ा।
ओस की छोटी सी एक बूंद उसके से छोटी नाक के अंतिम छोर पे आ पहुंची थी जहाँ से पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण के हठ से नीचे बुला रही थी मगर वो आने को तैयार नही थी। मैंने जिस एंगल से देखा वहाँ से नोज पिन के झलक में वो बून्द सुनहरी लग रही थी ।
पारदर्शिता पढ़ते वक्त ध्यान में नही आया था मगर उस दिन कंठस्थ हो गया कि स्वच्छ जल पारदर्शी होता है।
क्लास में जाके उसके साइड वाली बेंच पे बैठ गया। रात को झगड़ने से पहले मैंने ट्रिग्नोमेट्री पढ़ी थी इसलिए उसे सुनाने के अंदाज में मैंने एक दोस्त से कहा मुझे ट्रिग्नोमेट्री अभी तक समझ नही आया ।
मैं जानता था आगे क्या होने वाला है। वो मुझसे बदला लेने को सर से ट्रिग्नोमेट्री के सवाल पूछती। सर ट्रिग्नोमेट्री जिन स्टूडेंट्स को आता उनके बोर्ड पे बुलाते जिनको नही आता उन्हें डाँट की घुट्टी पिलाते।
हुआ भी यहीं इसने सर से सवाल पूछा , सर ने पूरे क्लास से पूछा और मुझे छोड़ किसी ने हाथ नही उठाया।
फिर सबको डाँट पड़ी और मैं बोर्ड पे जाके सॉल्व करने लगा और बाकी लोग सर की झिड़की सुनते रहे।
सॉल्व हो जाने के बाद सर ने उससे पूछा ," दिमाग में आ गई बात अब?
वो कुछ बोलती इसके पहले ही मैं बोल पड़ा ,"घुटनो में आया होगा सर इसके पास दिमाग नही है।
सारा क्लास हँसने लगा ," सर ने "भाग बेवकूफ " बोलके मूझे वापस सीट पे भेज दिया।
अगले एक घण्टे के क्लास में वो मुझे ऐसे देखती रही जैसे मैं उस वक्त उसके हत्थे चढ़ गया तो मेरा सर फोड़ देगी।
दिन के तीन बज रहे थे , हल्की हल्की धूप निकली थी मगर बादल आ जारहे थे। कमरें की खिड़की से बदली में छिपा सूरज ऐसे दिख रहा था जैसे चाँद दिन में आगया हो।
मैं रफ कॉपी लिए मैथ्स बनाने में लगा था पर मन नही लग रहा था।
एक अजीब सी बैचेनी हो रही थी। ऐसा तब ही होता है जब सामने वाला आपको याद कर रहा हो। मैंने कलम छोड़ के फोन उठा लिया। उसे कॉल करने का मन किया पर उसने मना किया था कॉल करने से।
इसलिए फोन वापस रख ख्यालों की दुनिया में कही और निकल गया तब तक मोबाइल पे एक बीप हुआ उसका मेसेज आया था , 5 बजे पार्क आना।
प्रेम में टेलीपैथी होता है , लोग दूर रहते हुए भी एक दूसरे के ईमोशन्स जाने जाते हैं । वो जान गई थी।
पार्क वो गुस्से में आई और आते ही फट पड़ी दस मिनट तक डाँटने के बाद मैं जब लड़ने के मूड में नही दिखा तो थकहार के पूछी ," क्या कर रहे थे दिनभर?
"नजरें गन्दी कर रहा था, किसी की तस्वीर देखकर" , मैंने शरारत भरी मुस्कान छुपाने नाकाम कोशिश की।
अपनी नजरों पे इतनी इनायत करने की कोई वजह? उसने एक एक लफ्ज चबा कर कहा।
"नजरों पे कोई इनायत नही कर रहा था बस सोच रहा था। तस्वीर की लड़की की छोटी सी नाक कैसे बड़ी की जाए।"
मैंने पिन कसा।
करोगे मुझे परेशान? चिढाओगे मुझे? आज मुझे पूरे क्लास के सामने मुझे चिढ़ाया। तुम्हें मुझसे प्यार नही हुआ.....तुम छोड़कर चले जाओगे। ," वो रोने लगी या रोने की ऐक्टिंग करने लगी , लेकिन उसके हाथ में फँसी मेरी उंगलिया और जोर से कस गई।
पगली दिल एक बार लगता है , जो बार बार होती है वो दिलग्गी है.......मैं छोड़कर नही जाता भले तुम चली जाओ, ये प्रोमिस है। ,"मैने कहा।
दोनों खामोश बैठे रहे........ उसके आंखों में आंसू आगये थे । बस उम्र बढा था मगर दिल से बच्ची थी वो।
उसने कंधे पे सर टिकाते हुए कहा ," 12th के बाद वाईज़ैग चलोगे? मेरी ग्रेजुएशन वही से होगी।
मैंने कहा ," मुझे लॉ करना है , पटना रुकना होगा या फिर बनारस जाना होगा।"
"इसका मतलब हमें अलग रहना होगा? " उसने कहा।
अलग नही रहना होगा , तुम छोड़कर जा रही हो, सीधे सीधे कहो! ," मैंने चिढ़ाया।
"मैं अलग रहना चाहती हूं? मैं? मैं?" ......वो लड़ पड़ी ,"तुम्हें प्यार नही होता होगा। मगर मुझे है ब्लाइंडली लव तुमसे ।
"बेवकूफ ब्लाइंड लव का कांसेप्ट ही फाल्स है । लोगों को बस खूबसूरत चीजों से प्यार होता है, नही तो इंसान खूबसूरत लोग के साथ चाहता ही क्यों? ," मैं उसे और लड़ते हुए देखना चाहता था।
"अच्छा तो तुम्हें भी मेरी खूबसूरती से प्यार हुआ है? मेरी फीलिंग्स तो तुमने समझी नही होगी?", वो लड़ने की मूड में आगई थी।
मैंने हंसी छुपाते कहा ," समझा न......तुम्हारी फीलिंग तुमसे ज्यादा खूबसूरत हैं।"
अब मुझे एक्सप्लेनेशन मत दो, तुम्हें मुझसे नही मेरे चेहरे से प्यार है ।
चले जाओ यहाँ से जल्दी वरना मुझसे बुरा कोई नही होगा।
चरम पे पहूंच गए उसके गुस्से पे पानी मारते हुए मैने कहा ,"अच्छा चॉकलेट तो खिला दे जो लाई है।
"नही ख़िलाती, जाओ खूबसूरत चॉकलेट ढूंढो" उसने सर हिलाते हुये मुंह बनाया।
हंसी दबाते हुए मैंने उससे कहा
" ठीक हैं फिर एक बार नाक से नाक लड़ा।"
"नही लड़ाती ...... तुम्हारी बड़ी है मेरी छोटी तुम हरा देते हो हर बार" ........ मासूमियत ओढ़े उसने रुआंसे होकर कहा.
इस वक्त वो इतनी प्यारी लगी की मैंने जबरन उसे सर से सर लगा लिया। उसने धीमे से कहा ," तुम हमेशा ऐसे ही क्यों नही रहते , चिढ़ाते क्यों हो मुझे?
ऐसे ही सेक्सी लगता है। कहकर मैं हँसने लगा वो मुझपे मुक्के बरसाने लगीं। दोनो देर तक बैठे रहे।
चलने को हुए तो उसने कहा KC सिन्हा के बुक क कवर पे तुम्हारे नाम के साथ अपना नाम लिख दिया है। " विनीत & ज्योति" मिटाना मत भले कवर में छुपा देना।
मैंने हामी भर दी मगर किस्मत ने नही ,उसने कुछ अलग ही लिखा था। चार साल बाद आज मैं वाइजैग में बैठा हूँ और वो बनारस में।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

कहानी रामजन्मभूमि की


जब बाबर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ उस समयजन्मभूमि सिद्ध महात्मा श्यामनन्द जी महाराज के अधिकार क्षेत्र में थी।
महात्मा श्यामनन्द की ख्याति सुनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा आशिकान अयोध्या आये । महात्मा जी के शिष्य बनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली और उनका नाम भी महात्मा श्यामनन्द के ख्यातिप्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा। ये सुनकर जलालशाह नाम का एक फकीर भी महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा। जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक ही सनक थी, हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना ।अत: जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ में छुरा घोंपकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिदबनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरेजलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने
की तैयारियों में जुट गए ।
सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा बाबर के विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द मक्का
बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपास की जमीनों में बलपूर्वक मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू किया॥
और मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबर को उकसाकर मंदिर के विध्वंस का कार्यक्रम बनाया।बाबा श्यामनन्द जी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख के बहुत दुखी हुएऔर अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ।
दुखी मन से बाबा श्यामनन्द जी ने रामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित किया और खुद हिमालय की औरतपस्या करने
चले गए।
मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामानआदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर
रामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए। जलालशाह की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट
लिए गए. जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने की घोषणा हुई उस समय भीटी के राजा महताब सिंह
बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए निकले थे,अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबर
मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी और अपनी छोटी सेना में रामभक्तों को शामिल कर १ लाख
चौहत्तर हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के ४ लाख ५० हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े।
रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी थी रक्त की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने देंगे।
रामभक्त वीरता के साथ लड़े ७० दिनों तक घोर संग्राम
होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेतसभी १ लाख ७४ हजार रामभक्त मारे गए।
श्रीराम जन्मभूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी। इस भीषण कत्ले आम के बाद मीरबांकी ने
तोप लगा के मंदिर गिरवा दिया ।
मंदिर के मसाले से ही मस्जिद का निर्माण हुआ पानी की जगह मरे हुए हिन्दुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया
नीव में लखौरी इंटों के साथ ।
इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार
हिंदुओं की लाशें गिर जाने के पश्चात मीरबाँकी अपने मंदिर ध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद
जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया..
इसी प्रकार हैमिल्टन नाम का एक अंग्रेज बाराबंकी गजेटियर में लिखता है की ”
जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बना के लखौरी ईटों की नीव मस्जिद बनवाने के लिए
दी गयी थी। उस समय अयोध्या से ६ मील की दूरी पर सनेथू नाम का एक गाँव के पंडित
देवीदीन पाण्डेय ने वहां के आस पास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय
क्षत्रियों को एकत्रित किया॥ देवीदीन पाण्डेय ने सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझेअपना राजपुरोहित मानते हैं ..अप के पूर्वज श्री राम थे और हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी।
आजमर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि को मुसलमान आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं
और खोद रहे हैं इस परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने की बजाय जन्मभूमि की
रक्षार्थ युद्ध करते करते वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा॥
देवीदीन पाण्डेय की आज्ञा से दो दिन के भीतर ९० हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोग
समूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में जन्मभूमि परजबरदस्त धावा बोल दिया ।
शाही सेना से लगातार ५ दिनों तक युद्ध हुआ । छठे दिन मीरबाँकी का सामना देवीदीन
पाण्डेय से हुआ उसी समय धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक लखौरी ईंट से पाण्डेय जी की खोपड़ी पर वार कर
दिया। देवीदीन पाण्डेय का सर बुरी तरह फट गया मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से खोपड़ी से बाँधा और
तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया। इसी बीच मीरबाँकी ने छिपकर गोली चलायी जो पहले
ही से घायल देवीदीन पाण्डेय जी को लगी और वो जन्मभूमि की रक्षा में वीर गति को प्राप्त
हुए..जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। देवीदीन पाण्डेय के
वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक जगह पर अब भी मौजूद हैं॥
पाण्डेय जी की मृत्यु के १५ दिन बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने सिर्फ २५ हजार सैनिकों के साथ
मीरबाँकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया । 10
दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए। जन्मभूमि में 25 हजार
हिन्दुओं का रक्त फिर बहा। रानी जयराज कुमारी हंसवर के स्वर्गीय महाराज
रणविजय सिंह की पत्नी थी। जन्मभूमि की रक्षा में महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी नेउनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और
तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध
जारी रखा। रानी के गुरु स्वामी महेश्वरानंद जी ने रामभक्तों को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज
कुमारी की सहायता की। साथ ही स्वामी महेश्वरानंद जी ने सन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने
२४ हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज कुमारी के साथ ,
हुमायूँ के समय में कुल १० हमले जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये।
१०वें हमले में शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और जन्मभूमि पर रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।
लेकिन लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने पूरी ताकत से शाही सेना फिर भेजी ,इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद
और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया।
श्रीराम जन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार सन्यासियों और 3 हजार वीर नारियों के रक्त से लाल हो गयी।
रानी जयराज कुमारी और स्वामी महेश्वरानंद जी के बाद यद्ध का नेतृत्व स्वामी बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया।
स्वामी बलरामचारी जी ने गांव गांव में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एक मजबूतसेना तैयार करने का प्रयास किया
और जन्मभूमि के उद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये. इन २० हमलों में काम सेकाम १५ बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर
अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के लिए रहता था थोड़े दिन बाद बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों केअधीन हो जाती थी..जन्मभूमि में लाखों हिन्दू बलिदान होते रहे। उस समय का मुग़ल शासक अकबर था। शाही सेना हर दिन के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी.. अतः अकबर ने बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया. लगातार युद्ध करते रहने के कारण स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य गिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर पर त्रिवेणी तट पर स्वामी बलरामचारी की मृत्यु हो गयी .. इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के रोष एवं हिन्दुस्थान पर मुगलों की ढीली होती पकड़ से बचने का एक राजनैतिक प्रयास की अकबर की इस कूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्त नहीं बहा।यही क्रम शाहजहाँ के समय भी चलता रहा। फिर औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और
उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे
मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ डाला।
औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये
का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के
सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ डाला।
औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु श्री रामदास जी महाराज जी के शिष्य श्री वैष्णवदास जी ने जन्मभूमि के
उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये।
इन आक्रमणों मे अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों ने पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदारगजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे।  ये सारे वीर ये जानते हुए भी की उनकी सेना और हथियार बादशाही सेना के सामने कुछ भी नहीं है अपने जीवन केआखिरी समय तक शाही सेना से लोहा लेते रहे। लम्बे समय तक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिएहजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया और अयोध्या की धरती पर उनका रक्त बहता रहा।ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों के वंशज आज भी सराय मे मौजूद हैं। आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के सूर्यवंशीय क्षत्रिय सिर पर पगड़ी नहीं बांधते,जूता नहीं पहनते,छता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तकजूता नहीं पहनेंगे,छाता नहीं लगाएंगे, पगड़ी नहीं पहनेंगे। 1640 ईस्वी में औरंगजेब ने मन्दिर को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व में एक जबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णवदास के साथ साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे । जबजन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के साथ चिमटाधारी साधुओं की सेना की सेना मिल गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर जाबाज़खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध किया ।चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार सेमुगलों की सेना भाग खड़ी हुई।
इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी ।
जाबाज़ खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ अयोध्या की ओर भेजा और साथ मे ये आदेश दिया की अबकी बार जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है ,यह समय सन् 1680 का था ।
बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा ।
पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंह सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर अपना डेरा डाला ।
ब्रहमकुंड वही जगह जहां आजकल गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है।
बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े ।
इन वीरों कें सुनियोजित हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद हसन अली भी युद्ध मे मारा गया।
औरंगजेब हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद 4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की। औरंगजेब ने सन् 1664 मे एक बार फिर श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया ।
इस भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग 10 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर दी नागरिकों तक को नहीं छोड़ा।
 जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें मुगलों ने उसमे फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया।
आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के नाम से प्रसिद्ध है,और जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है।
शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था ।
औरंगजेब के क्रूर अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्री रामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और जल चढाती रहती थी. नबाब सहादत अली के समय 1763 ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं की लाशें अयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियर मे कर्नल हंट लिखता है की
“ लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने की इजाजतदे दी पर सच्चा मुसलमान होने के नाते उसने काफिरों को जमीन नहीं सौंपी।“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ 62”
नासिरुद्दीन हैदर के समय मे मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए
हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं की शक्ति क्षीण होने लगी ,जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राम मे भीती,हंसवर,,मकर ही,खजुरहट,दीयरा अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के चिथड़े उड गये और उसे
रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल
शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया और हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमि में हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा।
नावाब वाजिदअली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओं ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया ।
फैजाबाद गजेटियर में कनिंघम ने लिखा “इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ।दो दिन और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं केमारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ने कब्रें तोड़ फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करने लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार करअयोध्या से खदेड़ना शुरू किया।
मगर हिन्दू भीड़ ने मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई हानि नहीं पहुचाई।अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था।हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बनाया । चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया ॥जिसमे
पुनः रामलला की स्थापना की गयी।कुछ जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार
नहीं हुई और कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल गयी।
सन 1857 की क्रांति मे बहादुर शाह जफर के समय में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर अली के साथ जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन 1858 को कुबेर टीला स्थित एक इमली के पेड़ मे दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया ।
जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित
हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस आखिरी निशानी को भी मिटा दिया…
इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति के कारण रामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफल
हो गया … अन्तिम बलिदान … ३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक के
लालची मुलायम सिंह यादव के द्वारा खड़ी की गईं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया औरविवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया।
लेकिन २ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमेंसैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दीं। सरकार ने मृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तु प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तट रामभक्तों की लाशों से पट गया था। ४ अप्रैल १९९१को कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दिया। लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीकमस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया।
परन्तु हिन्दू समाज के अन्दर व्याप्त घोर संगठनहीनता एवं नपुंसकता के कारण आज भी हिन्दुओं के सबसे बड़े आराध्य भगवान श्रीराम एक फटे हुए तम्बू में विराजमान हैं।जिस जन्मभूमि के उद्धार के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना रक्त पानी की तरह बहाया। आज वही हिन्दू बेशर्मी से इसे “एक विवादित स्थल” कहता है।सदियों से हिन्दुओं के साथ रहने वाले मुसलमानों ने आज भी जन्मभूमि पर अपना दावा नहीं छोड़ा है। वो यहाँ किसी भी हाल में मन्दिर नहीं बनने देना चाहतेहैं ताकि हिन्दू हमेशा कुढ़ता रहे और उन्हें नीचा दिखाया जा सके। जिस कौम ने अपने ही भाईयों की भावना को नहीं समझा वो सोचते हैं हिन्दू उनकी भावनाओं को समझे। आज तक किसी भी मुस्लिम संगठन ने जन्मभूमि के उद्धार के लिए आवाज नहीं उठायी, प्रदर्शन नहीं किया और सरकारपर दबाव नहीं बनाया आज भी वे बाबरी-विध्वंस की तारीख 6 दिसम्बर को काला दिन मानते हैं।और मूर्ख हिन्दू समझता है कि राम जन्मभूमि राजनीतिज्ञों और मुकदमों के कारण उलझा हुआ है।ये लेख पढ़कर जिन हिन्दुओं को शर्म नहीं आयी वो कृपया अपने घरों में रामका नाम ना लें…अपने रिश्तेदारों से कह दें कि उनके मरने के बाद कोई “राम नाम” का नारा भी नहीं लगाएं।
विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता एक दिन श्रीराम जन्मभूमि का उद्धार कर वहाँ मन्दिर अवश्य बनाएंगे।
चाहे अभी और कितना ही बलिदान क्यों ना देना पडे|

मैक्स हॉस्पिटल का लाइसेंस रद्द-राजनीतिक स्टंट

मैक्स हॉस्पिटल का लाइसेंस दिल्ली सरकार ने रद्द कर दिया है ,
अब ये हॉस्पिटल नए पेशेंट नही ले सकेगा जबतक फिर से बहाली न हो ।
सब लोग इस एक्शन की वाहवाही कर रहें ,
वाहवाही क्या लहालोट हुए जा रहें
वाह केजरी एक ही तो नेता है !!
ये नेतागिरी नही डिक्टेटरशिप है , मूर्खता है , जड़ता है ,
एक शब्द में यह मीडिया स्टंट है ।।
आपको पता होगा फोर्टिज वाला केस जिसमे 15 लाख का बिल दिया था डेंगू का और बच्ची को बचा भी नही सके , खूब आलोचना हुई थी हॉस्पिटल की ,
उसमे केंद्र सरकार ने बस जाँच की बात कह के मामला खत्म कर दिया , पता नही उस केस में क्या हुआ, न मीडिया ने फॉलो किया न हमने आपने
केजरीवाल जानता है लोग दोनों घटनाओं की तुलना करेंगे और बीजेपी वालो ने फोर्टिज केस में कुछ नही किया तो मुझे इसका राजनैतिक फायदा होगा ,
पर केजरी को एक बलि का बकरा मिल गया मैक्स हॉस्पिटल । राजनैतिक गिद्धों ने इतने बड़े हॉस्पिटल का लाइसेंस ही रद्द कर दिया ,
जिस दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाएँ दिन प्रति दिन दबाव में मरी जा रहीं , जहाँ पूरा भारत पहुँचता है इलाज के लिए , दिल्ली की ही जनसँख्या इतनी है भला वही इलाज करवा लें ऊपर से आस पास के राज्यों का ओवर लोड।
ऐसे में इतने बड़े हॉस्पिटल का लाइसेंस रद्द करने का क्या तुक ?
इसे एक्शन नही स्टंट कहते हैं ।।
सीधी बात है केस है , criminal negligence का , मने एक डॉक्टर ने एक जिन्दा new born को dead घोषित कर दिया ,
और बाद में परिजनों को पता चला वो जिन्दा है ,
जाहिर सी बात है ऐसी खबरें आपको झकझोर देती हैं ,
आप चाहते हो तुरंत एक्शन हो , पर एक्शन किसके खिलाफ होना चाहिए ?
डॉक्टर के खिलाफ जिसने ऐसा किया ?
या फिर पूरा हॉस्पिटल ही दोषी है ?
मने कोई डॉक्टर रूठ जाए अपने ही अस्पताल के management से तो यही काण्ड कर दे
और लिख दें हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले जाएँगे
एक प्रशासक के तौर पर केजरीवाल को कायदे में करना ये था कि पूरा management जाँच के दायरे में लेना था , डॉक्टर के ऊपर केस चलाना था , कानूनन जो कार्रवाई बनती , होना था
पर इसकी सजा सबको दी गयी मने टके शेर भाजी टके शेर खाजा ।।
कोई 20 बेड का हॉस्पिटल नही है मैक्स ।
कितने लोगो की जिंदगी वहाँ appointment लिए लाइन में लगी होगी ,
बस का ड्राइवर दारु पी के बस चलाये तो टाटा का प्रोडक्शन ही बन्द कर दो , ये कहाँ का न्याय है ?
जनता तो चाहती है कि बलात्कार के दोषी का लिंग काट दिया जाय
तो सरकार में रहते तुम कटवा दोगे ?
या जो कानून है उसका पालन करोगे ।। लायसेन्स रद्द करना मेरी नजर में बुद्धिमानी नही स्टंट है
कल को कोर्ट जाएगा हॉस्पिटल हो सकता है बहाली भी हो जाए । सत्येंद्र जैन की इमेज चमकाने के लिए की गयी वाहियात हरकत है ये ।।
केजरीवाल ये stunt है ,
Stunt ।।
अपना मंत्री सम्भालो , स्टंट मत करो उसके ऊपर बहुत केसेज चल रहे । ऐसे स्टंट्स से मूर्खो को मूर्ख बनाया जा सकता है
आपियो को बनाते रहो ।
भ्रष्टाचारी मंत्री को ऐसे स्टंट से चमकाने का सस्ता प्रयास है ।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

देश में

देश के भीतर उत्पन्न हो रहे अनैतिक माहौल और
असहज़ वातावरण के निवारण के लिए सरकार को निम्न कार्यों को
करना अत्यंत आवश्यक है।।।।
१. हर समाज की महिलाओं के लिए सुरक्षित घर।
२. सिंगल विंडो इमरजंसी सहाय केंद्र हर जिले में
तहसील स्तर तक।
३. प्रायमरी स्कूल से उच्च शिक्षा तक 100
फीसदी फी माफी।
जिसे अन्य इंश्योरेंस के माध्यम से लागू किया जाए।
४. महिलाओं को रोजगार हेतु न्यूनतम डेढ़ लाख तक
सब्सीडी देकर मदत करना।
५. महिलाओं के लिए अलग फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट।
६. किसानों के लिए उर्वरक, बीज एवम अन्य उपकरणों
तक पहुंच को आसान बनाना।
७. अपराधों पर शीघ्रता से रोक हेतु पुलिस के समानांतर
एक विंग बनाना।
८ न्यायपालिका के कार्यों में और अधिक पारदर्शिता लाने के लिए
सिंगल विंडों अनिवार्य करना।
मेरी निजी राय है आप सभी
प्रतिष्ठित लोगों की राय के साथ प्रयास का
आकांक्षी ।।।।।

एक मुलाकात

"हम पहले कभी मिले हैं?"
सुधा ने बच्चो जैसी शरारती मुस्कराहट
के साथ कहा ,"शायद!"
"शायद! कहाँ?" मैंने पूछा।
सुधा बोली "हो सकता है हम किताबों में मिले हों।"
"लोग कॉलेज में, ट्रेन में, फ्लाइट में, बस में , लिफ्ट में , होटल
में, कैफ़े में तमाम जगहों पर मिल सकते हैं लेकिन कोई किताबों में
कैसे मिल सकता है?" मैंने पूछा।
इस बार मेरी बात काटते हुए सुधा बोली
,"दो मिनट के लिए मान लीजिए। हम
किसी ऐसी किताब के किरदार हों जो
अभी लिखी ही नई गई हो
तो?"
ये सुनकर मैंने चाय के कप से एक लंबी
चुस्की ली और कहा " मजाक अच्छा
कर लेती हैं आप !"
~' मुसाफ़िर कैफे'
जारी रहेगी कहानी .......

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

शौर्य दिवस

मुल्ला मुलायम का दम्भ "परिंदा भी पर
नहीं मार सकता", और वाकई मुल्ले मुलायम ने
जबरदस्त तैयारियां कीं थीं। मुस्लिम
परस्ती में औरंगजेब भी कहीं दूर पीछे छूट
चुका था उस वक्त, जिसे हम आजादी या
स्वाधीनता कहते हैं। आप ये देखिये सब्जी
मंडियों, अनाज मंडियों को भी अस्थाई
जेल बना दिया गया था। जगह जगह
गिरफ्तारियां पूरे प्रदेश को ही जेल बना
दिया गया था। सरकार की मुस्लिम
परस्ती का आलम ये था कि अगर आप
अभिवादन में राम राम कहते थे और अगर
किसी पुलिस वाले ने या किसी सपाई ने
सुन लिया तो आप बिना किसी कारण के
गिरफ्तार हो जाते थे। वाकई उस दौर में हम
लोग अनुमान लगाते थे कि मुस्लिम शासन में
हमारे पूर्वज किस तरह जीवन जीते होंगे, और
हमारा सर उनकी जिजीविषा के प्रति
श्रद्धावनत हो जाता था कि कितनी
विपरीत परिस्थितियों के बाद भी धर्म
को बचाए रखा। कितना कंटकाकीर्ण
मार्ग होने के बावजूद भी राम जन्म भूमि
को बाबर के पाप से छुड़ाने के लिए
लगातार लड़ाइयां लड़ते रहे।शायद ३०
अक्टूबर १९९० था, सुबह से एक अजीब
सन्नाटा पसरा था, तब आज की तरह
सोशल मिडिया था नहीं, दिन काटना
मुश्किल हो रहा था। आसरा था तो
रेडियो और अख़बार। । सरकार की सख्ती
के कारण फ़ैजाबाद में कोई घुस नहीं सकता
था। पूरे प्रदेश में कर्फ्यू का सा माहौल था,
लेकिन जब मरने पर ही उतारू हो महाकाल के
वंशज तो रोक कौन सकता है। और वही हुआ
शाम ५ बजते ही दैनिक जागरण का स्पेशल
एडिशन आया कि मुलायम की सारी
नाकेबन्दी को धता बता कर "एक गुम्बद पर
भगवा फहरा दिया गया" और तो फिर
खुशियों की अतिरेक....... वो ख़ुशी आज तक
महसूस नहीं हुई। थालियां बजीं, घण्टे बजे,
घी के दिए जले। कर्फ्यू को धता बता कर
पब्लिक सड़क पर आ गई।
उसके बाद के दिन तो बहुत कष्टपूर्ण रहे,
अयोध्या फिर से खून में नहाई अपने
औरंगजेबी फरमान के कारण मुलायम "मुल्ला"
घोषित हुए। लेकिन उसके दो वर्ष बाद ही
हिंदुओं ने ७६ लड़ाइयों और लाखों
बलिदानियों का ऋण चुका अपने पांच सौ
साला कलंक को धो दिया।
बमुश्किल तारीखों को इतिहास बनने का
मौका मिलता है, हिन्दू गर्वोन्मत्त होकर
सर उठाया और छः दिसम्बर १९९२ इतिहास
बन गया। "जय श्री राम"

शर्मसार

सरकार आंखे बंद करलो , विकास के खोखले दावों के ढोल बजाओ
झारखंड के मधुपुर के सरकारी अस्पताल में शर्मसार
कर देने वाली तस्वीर. एक
ग़रीब महिला को सड़क पर ही बच्चे को
जन्म देना पड़ा. सोशल मीडीया पर वायरल
इस तरवीर मे बताया जा रहा है कि यह घटना मधुपुर
(झारखंड) की है. "मधुपुर सरकारी
अस्पताल में डाक्टर द्वारा भर्ती न किये जाने पर महिला
ने बाहर अपने बच्चे को जन्म दिया." इससे पहले भी
झारखंड के चांडिल में ऐसी घटना हुई थी
जिसकी ख़बर पूरी दुनिया में फैल गई
थी
ऐसे में हैरानी वाली बात है ये कि हमारे
टैक्स के पैसे से कुछ विकास नही हो पा रहे है
हर जगह खोखले दावे किए जा रहे है और हम बेहाल हुए रहे
है !

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

नासमझ

बालों में घूमती हुई लड़की
की उंगलियाँ अचानक से उसके गर्दन पे जाके ठिठक
गई। दोनो जड़वत हो गए। फिर एक जुम्बिश हुई और
लड़की ने हारनुमा कुछ पकड़ते हुए लड़के के आंखों
में झांका , मानो कह रही हो , ये तो उसका दिया है जो
तुम्हें छोड़ गई थी?
कुछ पल तक उन निश्छल आंखों में देखने के बाद लड़का बोला "
मैं उसे कभी छोड़ के नही आया।"
"मेरे जाने के बाद मुझे भी इतना ही
चाहोगे? लड़की रुआंसी होकर उसके
सीने से लिपट गई।
लड़के ने उसे जोर से भींच लिया फिर एक
फुसफुसाहट हुई,
"मैं तुम्हें जाने नही दूंगा।"

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

निकाय चुनाव एक विश्लेषण

एक विश्लेषण~
इन चुनावों में एक चीज स्पष्ट निकल कर सामने आई
16 शहरी निकाय को छोड़ दें तो भाजपा का प्रदर्शन
ग्रामीण और अर्ध्ग्रामीण क्षेत्रों में
अच्छा नहीं रहा।
बुंदेलखंड में भाजपा आम तौर पर साफ़ हो गई, फतेहपुर में
निराशाजनक प्रदर्शन रहा, हरदोई में सूपड़ा साफ़ हो गया। उन्नाव में
अपना आधार गंवाया, फर्रुखाबाद में वोटों में घटत साफ़ दिखाई
दी।
भाजपा ने नगरपालिका में 1 तिहाई (33%) सीटों पर और
नगरपंचायतों में सिर्फ 1 चौथाई (25%) सीटों पर
ही सफलता हासिल करी। स्पष्ट है
ग्रामीण क्षेत्रों की जनता ने
इनकी नीतिओं को स्पष्ट तौर पर नकार दिया
परन्तु शहरी क्षेत्र के लोग आर्थिक मामलों के कुछ
कम जानकार निकले
प्रदेश भर में 298 नगर परिषद और 438 नगर पंचायत में
बीजेपी बुरी तरह पराजित हुई
है।
शहरी क्षेत्र में गोरखपुर में जिस वार्ड में जहाँ
योगी आदित्यनाथ ने खुद वोट दिया वहां भाजपा पार्षद
प्रत्याशी खुद चुनाव हार गया। कानपुर में राष्ट्रपति
श्री रामनाथ कोविंद के वार्ड से भाजपा हार गई। वहां
बसपा प्रत्याशी ने रेकॉर्डतोड़ तरीके से
जीत हासिल की और भाजपा
की प्रत्याशी तीसरे स्थान पर
रह गई।
मजेदार खबर झींझक नगरपालिका कानपुर से आई जहाँ
से राष्ट्रपति की भतीजी
पालिकाध्यक्ष के चुनाव में हार गई। वो भाजपा से टिकट मांग
रही थीं और न मिलने पर
निर्दलीय समर के कूद पड़ीं। आखिर में
उनको 363 मतों से संतोष करना पड़ा जो कुल मतदान के 3 प्रतिशत
से भी कम रहा। यहाँ बसपा प्रत्याशी
विजयी रही जबकि भाजपा दूसरे स्थान पर
रही जिनको विजयी प्रत्याशी
से मात्र 100 मत कम मिले।
शहरी क्षेत्रों में मतदाता ने भाजपा को पूर्ण रूप से
नकारा नहीं है और वो कहीं न
कहीं इनकी नीतियों पर भरोसा
करके चल रहा है। उसका क्षेत्रीय दलों से विश्वास
उठा हुआ है और राष्रीय स्तर पर वो
विकल्पहीनता की स्थिति में है। फिलहाल
आने वाले राज्यों के चुनाव काफी चीजों को
स्पष्ट कर देंगे। राजनीती की
दिशा वैसे भी निकाय चुनाव तय नहीं कर
पाते। पिछले काफी वर्षों में शहरी निकाय में
भाजपा का ही परचम लहराया है जबकि प्रदेश ने
इनकी सरकार नहीं थी। इन
चुनावों को इस तथ्य से भी जोड़कर देखना चाहिए।

रविवार, 26 नवंबर 2017

कुछ अनकही

"जग जाओ न अब। आधे घंटे से तुम्हारी खर्राटे सुन रही हूँ।" प्रिया ने ईयरफोन की माइक ठीक की और नींद से भारी पलकों को खोल मोबाइल में समय देखा। सुबह के आठ बज रहे थे।
"उठ जायँगे बाबू , अभी तो सोये हैं, " अलसाई सांसो से भरी खामोशी की एक अंतरा के बाद विकास ने कहा ।
" प्लीज जग जाओ , ट्रैन हैं दस बजे से। " प्रिया ने हठ किया।
मगर इस से बेअसर विकास शोख हुआ ,"जग जाएंगे, अगर तुम प्रोमिस करो यहाँ से जगाओगी तो अपने पहलू में सुलाओगी?
उसकी उन्नीन्दी सांसे प्रिया के रगों में सिहरन उलीच रही थी। पर उसने बनावटी गुस्से में कहा
"बस करो मुझे पता है तुम पहलू से निकलोगे तो कहाँ कहाँ बहकोगे ?
"अरे आपकी जवानी , महुए का पानी। हम कैसे न इधर उधर बहकें," विकास आसानी से मानने वालों में से नही था।
"ठीक है फिर तुम देखो कैसे महुए की पानी ,नीम की पानी बनती है। टिकट कैंसिल कर रहे हैं तुम्हारा अकेले आना" , प्रिया ने फोन रख दिया , सच में देर हो रहा था।
फोन कटने के साथ विकास ने घड़ी देखा साढ़े आठ बजे गए थे। वो टॉवल लिए बाथरूम भागा।
.............................................................
कॉलेज जब शुरू हुआ था तो सीधी साधी मूरत लगती थी प्रिया। ठहर ठहर के बोलना और खुद में खोई रहना ही उसका शगल था। ऐसा लगता था एक सन्नाटा गुजरा है उससे होकर और वो उससे उबर नही पाई हो। पर कॉलेज में आने पे इस शून्यता और सन्नाटे की बर्फ़ पे जाने अनजाने कोई ताजे पानी की फुहारें मारने लगा था। माइनस सोलह डिग्री सेल्सियस जीरो डिग्री सेल्सियस की गर्मी से पिघलने लगा था।
क्लास में जब वो बैठती तो पीछे के बेंच से एक झीनी सी छन की आवाज आती और उसकी आँखें खुद ब खुद उधर खींची चली जाती। एक लड़का बैठता था , अंत की पंक्तियों में, कसी पैंट और कमर के नीचे शर्टिंग हुई शर्ट पहने। उसकी कलाई में मोटे चेन की घड़ी और ब्रेसलेट थी।अक्सर लिखते लिखते जब वो थकता तो हाथों को जुम्बिश देता फिर ब्रेसलेट और घड़ी आपस मे छन की आवाज से आवाज से टकराते। आहिस्ते आहिस्ते यह आवाज उसकी कमजोरी बनती चली गई। छन की आवाज पे मुड़ जाना एक अनकही रीत बन गई उसकी।
बदस्तूर दिन महीने बीत के साल होते गए। वो लिख के थकता रहा , कलाई हिलती रही छन्न की आवाज आती रही वो मुड़ती रही मगर उससे आगे कुछ न हुआ।
न वो पहल करता न ये राब्ते की कोशिश। शायद दोनों को ज्ञात था कि मिलना उनकी नियति है। इसलिए वो चुप थे , कोई जल्दबाजी नही था।
समय आया , वो मिल भी गए और रफ्ता रफ्ता आहिस्ते आहिस्ते और घुलते गए एक दूसरे के रगों में । ये मिलन प्राकृतिक था मानवीयता रत्ती भर नही था इसमें । न कोई बनावटीपन।
प्रिया ने एक बार पूछा भी था क्या तुम मुझे कभी ऐसे इजहार (प्रपोज) नही करोगे? जैसे और लोग करते हैं? जैसे फिल्मों में करते हैं?
तब उसने कहा था अगर हिंदी में मुझे ," तुमसे प्यार है,
इंग्लिश में I LOVE YOU
और फ्रेंच में je a'time
कह देना ही प्रपोज है तब तो कतई नही। इजहार आंखों से झलकना चाहिए और लहजे से गुज़र दिल में उतरते चले जाना चाहिए।
वो चुप हो गई , उसकी गहरी बातें अक्सर चुप कर देने वाली होती थी।
उसका एक ही सिफत था , फ़क़त इश्क़ , फ़क़त इश्क़, फ़क़त इश्क़ , सिवाय इसके कुछ भी नही
वो जो भी कहता वो इश्क़ था, जो भी करता वो इश्क़ था। उसके सामने आते वो ऐसे लगती जैसे नवरात्रि में उड़हुल फूल; साधारण पर , सबसे ख़ास ,सबसे विशिष्ट , सबसे जुदा, सबसे अलहदा।
वो समझ नही पाती उसे महसूस कर के वो क्या हो जाती। यूँ लगता जैसे वो हवा में उड़ती हल्की फुल्की सोनचिरैया हो जो बस नभ में विचरते जा रही हो पंख फैलाये।
बचपन से ही उसकी माँ नही थी। उदास , खोए खोए रहना उसके जिंदगी की रवायत हो गई थी मग़र विकास ने सब बदल दिया था। जिंदगी प्रेम के नाज़ुक सुरों में गूँथ दी थी उसने।
वो उससे प्रेम करता और उसे आह्लादित कर देता। प्रिया के पास देने के लिए कुछ नही बचता। वो चुप बस उसे निहारते रहती । कितना मजबूत और खुशमिजाज था वो
कभी कभार साथ घूमते वक्त जब वो अपना हाथ उसके कंधे पे रखता तो ऐसा लगते मानो वक्त ने सिमट के उसके कंधे पे ठौर ले लिया हो। उसके प्रेम में वैराग्य था। जिस्म नगण्य था रूह प्रधान थी।। इतना मुहब्बत पाकर वो डर जाती उसे कभी इतना प्रेम अपने जीवन मे नही देखा था ।
अगले तीन साल ऐसे बीते की कभी महसूस ही नही हुआ साल में 365 दिन होते हैं।
उसके संगत में वो कब सीधी साधी मूरत से बातूनी चंचल मशीन होती चली गई पता ही नही चला।
पढ़ाई ख़त्म हो गई अब जॉब की बारी थी। उसे जॉब नही करना था।
विकास का कैम्पस प्लेसमेंट हो गया था।
कॉलेज से जाने में तीन दिन बचे थे । वो प्रिया से मिलने आया । बातें होने लगी प्रिया ने पूछा
अब बताओ अपने फ्यूचर का क्या होगा ? शादी करोगे मुझसे?
वो बस मुस्कराया फिर छेड़ते हुए बोला ,"नही ,बिना शादी किये दर्जन भर बच्चे होने का कोई तरीका हो तो बताओ वहीं करेंगे ।
"धत पागल" प्रिया ने हंसकर उसे मुक्का मार दिया। दोनो हंसने लगे।
उसने बताया कि वो पापा से बात करेगा।
और अपने होस्टल चला गया प्रिया बाहर रहती थी वो अपने फ्लैट चली आई।
रात के दस बजे प्रिया ने कॉल किया तो उसका फ़ोन व्यस्त जा रहा था । ग्यारह बजे भी व्यस्त , बारह बजे भी व्यस्त । थक हार कर उसने उसके माँ के फ़ोन लगाया वो भी व्यस्त थी। । प्रिया समझ गई । उसने फोन करना बंद कर दिया साढ़े बारह के आसपास उसने कॉल किया। बेहद थका और ऊबा लग रहा था। किसी अनजान डर से डरके प्रिया ने बिना देर किए उसे अपने पास बुला लिया।
8 घण्टे पहले जिसके पासभर होने से वो खुद को महफूज समझती थी अभी बेबस कटे हुए पेड़ की तरह लग रहा था ।
मिलते ही वो उससे लिपट के सिसकने लगा ," प्रिया हम भागकर शादी कर लेंगे। कास्ट का कोई मतलब नही होता ,एकाध साल बाद मम्मी पापा मान जाएंगे।
प्रिया ने उसे खुद से भींच लिया। वो बच्चे की तरह सिमटता चला गया। औरत की खासियत होती है , माँ बनने के लिए उसे बच्चे और उम्र की आवश्यकता नही होती है। बस परिस्थितियाँ होनी चाहिए वो अपने पिता की भी माँ बन सकती है। और प्रिया तो माँ के जाने के बाद से ही अपने टूटे हुए पापा की माँ बन गई थी।
आज भी वो माँ बन गई अपने प्रेमकी और वो बच्चों की तरह लिपट के उससे रोता रहा और वो उसके बालों को सहलाती रही उसे जिंदगी की हकीकत समझाती रही। माँ बाप की अहमियत बताती रही। वो जानती थी माँ के होने के मायने क्या हैं।
उसने खुद से शादी को मना कर दिया। वो जिद करता रहा वो उसे निष्ठुरता से ऐसे समझाती रही जैसे उनका इश्क़ कभी शादी के लिए बना ही न हो।
सुबह हो गई दोनो सो गए। प्रिया ने उसे सहज कर दिया। कल होके उन्हें घर निकलना था । दोपहर को वो होस्टल चला आया ।पूरी पैकिंग बाकी थी। रात भर पैकिंग करता रहा सुबह 4 बजे सोया मगर आठ बजे उसका फ़ोन आगया स्टेशन आने के लिए। उसका जगने का मूड नही था पर प्रिया की बातें वो काट नही सकता था।
....................…...........................
दस बजने में दस मिनट बाकी थे वो भागते हुए प्लेटफार्म आया । वो बोगी के बाहर खड़े उसका इंतिजार कर रही थी । दोनो साथ बैठ गए। रास्ते भर बीते कल की बात होती रही। वो आगे के बारे में कुछ सुनना नही चाहता था और वो सुनाना नही चाहती थी। बारह घण्टे के सफर में दोनों पुरानी यादों को जिंदा करते रहे। वो चाहता था एक और कोशिश करना मगर प्रिया ने साफ मना कर दिया। अगली सुबह दोनों गंतव्य पे आ गये थे। स्टेशन से उतरते वक्त प्रिया ने अपना अपना पैंडेंट उतारकर उसके गले में डाल दिया। उसने भी अपना ब्रेसलेट खोल कर उसके हाथों में डाल दिया। प्रिया चाहती थी एक बार उसके बाहों में जकड़ जाए । वो जकड़ भी जाती स्टेशन पर खड़े तमाम लोगों की परवाह किये बगैर , पर उनलोगों में उसके पापा भी थे। वो चुपचाप बाहर खड़े कार में आकर बैठ गई।
रात के दस बज रहे थे रेडियो पे RJ साएमा ने पुरानी जीन्स में लता मंगेशकर का गाना लगाया हुआ था......"हम भूल गए रे हर बात मगर तेरा प्यार नही भूले" वो धुआँ धुआँ होने लगी। पापा सवाल पे सवाल पूछ जा रहे थे वो बस हूँ हाँ किये जा रही थी।
............... .
दोस्त को आने का मैसेज कर विकास वहीं स्टेशन के खाली पड़े बेंच पे बैठ गया था।
कुछ देर में दोस्त आ गया। विकास ने चलते वक्त अपने कलाई से घड़ी गिरा दी। शोर में शायद छन की आवाज दब गई या इसबार घड़ी बेमतलब की छन करना नही चाहती थी।

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

गौरवगाथा

वियतनाम विश्व का एक छोटा सा देश है जिसने..... अमेरिका जैसे बड़े बलशाली देश को झुका दिया।
लगभग बीस वर्षों तक
चले युद्ध में अमेरिका पराजित हुआ था अमेरिका पर विजय के बाद वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष से एक पत्रकार ने एक सवाल पूछा.....
जाहिर सी बात है कि सवाल यही होगा कि आप युद्ध कैसे जीते या अमेरिका को कैसे झुका दिया ??
पर उस प्रश्न का दिए गए उत्तर को सुनकर आप हैरान रह जायेंगे और आपका सीना भी गर्व से भर जायेगा।
दिया गया उत्तर पढ़िये।
सभी देशों में सबसे शक्ति शाली देश अमेरिका को हराने के लिए मैंने एक महान व् श्रेष्ठ भारतीय राजा का चरित्र पढ़ा।
और उस जीवनी से मिली प्रेरणा व युद्धनीति का प्रयोग कर हमने सरलता से विजय प्राप्त की।
आगे पत्रकार ने पूछा...
"कौन थे वो महान राजा ?"
मित्रों जब मैंने पढ़ा तब से जैसे मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया आपका भी सीना गर्व से भर जायेगा।
वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष ने
खड़े होकर जवाब दिया...
"वो थे भारत के राजस्थान में मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप सिंह !!"
महाराणा प्रताप का नाम
लेते समय उनकी आँखों में एक वीरता भरी चमक थी। आगे उन्होंने कहा...
"अगर ऐसे राजा ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने सारे विश्व पर राज किया होता।"
कुछ वर्षों के बाद उस राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु हुई तो जानिए उसने अपनी समाधि पर क्या लिखवाया...
"यह महाराणा प्रताप के एक शिष्य की समाधि है !!"
कालांतर में वियतनाम के
विदेशमंत्री भारत के दौरे पर आए थे। पूर्व नियोजित कार्य क्रमानुसार उन्हें पहले लाल किला व बाद में गांधीजी की समाधि दिखलाई गई।
ये सब दिखलाते हुए उन्होंने पूछा " मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप की समाधि कहाँ है ?"
तब भारत सरकार के अधिकारी चकित रह गए, और उनहोंने वहाँ उदयपुर
का उल्लेख किया। वियतनाम के विदेशमंत्री उदयपुर गये, वहाँ उनहोंने महाराणा प्रताप की समाधि के दर्शन किये।
समाधी के दर्शन करने के बाद उन्होंने समाधि के पास की मिट्टी उठाई और उसे अपने बैग में भर लिया इस पर पत्रकार ने मिट्टी रखने का कारण पूछा !!
उन विदेशमंत्री महोदय ने कहा "ये मिट्टी शूरवीरों की है।
इस मिट्टी में एक महान् राजा ने जन्म लिया ये मिट्टी मैं अपने देश की मिट्टी में
मिला दूंगा ..."
"ताकि मेरे देश में भी ऐसे ही वीर पैदा हो। मेरा यह राजा केवल भारत का गर्व न होकर सम्पूर्ण विश्व का गर्व होना चाहिए।"

वे 90 के दशक

90 के दशक को याद करता हूँ तो सबसे पहली यादों में "तुझे न देखूं तो चैन मुझे आता नहीं है" वाला गाना आता है..और "ऐसी दीवानगी देखी नहीं कभी" पर मेज को ढोलक की तरह बजाना याद आता है..माता के जागरण में कांगो बजाने वाले को मैं बड़े कौतूहल से देखता था..
उन दिनों दोपहर बहुत लम्बी हुआ करती थीं..तब नींद भी दिन में कहाँ आती थीं..दांत टूट गया था...सीटी बजाना अपने आप आ गया था..गाने भी तब सिर्फ किसी कैसेट की दुकान के सामने से निकलते ही सुनने को मिलते थे..
बैटरी से मोहल्ले में किसी के घर फिल्म देखते हुए..सफ़ेद घोड़े और काले घोड़े की दौड़ के सीन पर हीरो और विलेन के बाद सबसे ज्यादा ध्यान रहता था...मैं रेसिस्ट नहीं हूँ पर उस वक़्त मैं हमेशा सफ़ेद घोडा ही चुनता था..कभी कभी चौपाल पर रागिणी गायकी का कम्पटीशन होता था..या किसी के यहाँ शादी होने पर रौशनी के लिए जो जेनरेटर चलाया जाता था..वो मुझे बड़ा सुकून देता था..जेनरेटर की आवाज और लोगों की चहल पहल मुझे रोज रात को लगने वाले डर से आजाद कर देती थीं..मैं और मेरे दोस्त दावत से ज्यादा जनरेटर के आस पास ही पाये जाते थे..कभी उसमे से चिंगारी निकलते देख खुश होते..कभी उसके बंद होने पर भाग के पानी भर भर के लाते..
इस बहाने हम सब दोस्तों की टोलियों को रात में अँधेरी गलियों में दौड़ लगाने की हिम्मत भी मिल जाती थीं..

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

बदचलन और बदनसीब लड़की(छोटी सी कहानी)

"तलाक तलाक तलाक "जैसे ही रिया के कानों में पिघले सीसे की तरह बिगड़ैल नबाब साहब के ये शब्द पड़े।दिल मे हूक सी उठी आँखों के आगे अंधेरा छा गया।वो दोनों हाथों से सर पकड़कर धम्म से उस आलीशान सोफे पे गिर पड़ी।आँसुओ के बहते आवेग में उसे पुरानी बातें याद आने लगीं।
बनारस के ब्राह्मण खानदान में बचपन से ही अद्वितीय सुंदर एकलौती बेटी रिया को सबसे ज्यादा प्यार उसके पुजारी पापा करते थे।छोटी थी तो कंधे पे बिठाकर बनारस की घाटों पर शाम में घूमते हुए लोगों से कहते कि "देखना एक दिन ये मेरा और मेरे कुल का नाम रोशन करेगी”।
उम्र बढ़ी तो सुंदरता और जवानी और निखरी।रिया के तीखे नयन हिरनी सी कमर गोरा और गदराए जिस्म पे एक छोटी मोटी मूवी बनाने वाले डायरेक्टर की नज़र पड़ी तो उसने अपनी मूवी में एक छोटा सा रोल और मॉडलिंग के लिए आफर दे दिया और रिया ने भी हीरोइन बनने का सपने संजो रखे थे।
मॉडलिंग और मूवी में रिया के काम करने को लेकर घर पे खूब कोहराम मचा ,रोना धोना जम के हुआ आखिर में रिया के जिद की जीत हुई।ग्लैमर और पैसे का लालच बुद्धि और इज़्ज़त पे भारी पड़ गया और रिया अपने परिवार के अरमानों को रौंदते हुए मुम्बई चल दी अपने सपनों को पूरा करने।
कुछ दिनों तक मुम्बई के एक परिचित रिश्तेदार के यहाँ रहकर एक्टिंग की ट्रेनिंग लेते हुए मॉडलिंग की फिर उसने वो छोटा रोल बखूबी निभाया लेकिन ग्लैमर की दुनिया का काला सच यह भी है कि इस दुनिया में सफलता पाने के लिए टैलेंट के अलावा या तो कोई गॉडफादर चाहिए या फिर इज़्ज़त का सौदा करना पड़ता है।
जब बहुत स्ट्रगल करने के बाद भी काम न मिला तो आखिर में रिया को कॉम्प्रमाइज़ करना पड़ा।अपनी सुंदरता और शरीर का इस्तेमाल कर वह काम पाने में कामयाब हुई और बहुत तेजी और आसानी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगी।
यही उसकी मुलाकात एक खानदानी बहुत पैसे वाले पैतालीस वर्षीय बिगडैल नवाब से हुई जो अपने ब्लैक मनी को फिल्मों में फाइनेंस करता था।अब रिया के लिए नैतिकता और पिता की सिखाई अच्छी बातों का कोई मोल न था शराब ड्रग्स जिस्मफरोशी सब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे।परिवारवालो के संबंध
रिया से लगभग ख़त्म हो चुके थे।
अंत में रिया उस मोटे पैसे वाले नवाब को अपने हुस्न के जाल में फसाने में कामयाब हो गयी।नवाब ने भी पहली बीवी को तलाक देकर बहुत शानो शौकत के साथ रिया से निकाह किया इस निकाह में शहर बड़े बड़े लोगों ने शिरकत की।खूब शानदार दावत और मेहमाननवाज़ी हुई ,पत्रकार मीडिया सब ने इस शाही शादी के सम्मान में कसीदे पढ़े।लजीज वयंजनो की महक वऔर लाइटो से पूरा महल जगमगा उठा,पर दूर बनारस में पंडितजी ने शर्मिदगी सेे घर में घनघोर अंधेरा कर रखा था।रिया के परिवार से कोई उस शादी में न गया था।पर रिया को इस बात का कोई मलाल न था।वो नकली ग्लैमर सफलता और पैसे के नशे में चूर थी।उसे अपनों का प्यार याद न था।उधर लोग खूब खुश होकर जमकर मिठाइयाँ और लजीज खाने का आंनद ले रहे थे इधर बनारस में दुल्हन के घर खाना ना बना था।उधर नाच ,गाना संगीतऔर मस्ती थी इधर करुण रुदन और दर्द।
दो सालों तक नवाब थोड़ा रिया के प्रेम में पागल रहा फिर उसकी पहले की तरह आय्याशियाँ शुरु हो गईं।जब रिया को नवाब की किसी और उभरती मॉडल से निकाह की खबर सुनी तो वह गुस्से से पैर पटकती हुई नवाब से बात करने गयी तो उसे "तलाक तलाक तलाक 'शब्द सुनने को मिले।जिस पैसे शानों शौकत और रुतबे के लिए उसने नवाब से शादी की थी वो उसके हाथ से फिसलती नज़र आई।
नवाब चिल्ला रहा था "जा बदचलन लड़की तलाक के बाद अब तेरी इस महल में कोई जगह नही।"रिया नीचे जाने के बजाए महल के छत पर गयी।उसे पापा के साथ बनारस में कंधे पर घूमना और परिवार का प्यार याद आ रहा था।'पापा मैं आपका नाम रोशन न कर सकी माफ कीजियेगा" बुदबुदाते हुए छत से कूद गई।
अगले दिन समाचार पत्रों में रिया की छत से पैर फिसलने से गिरकर मौत की खबर छपी थी ।अफसोस उस बदनसीब लड़की की मौत पे रोने वाला कोई न था इधर नवाब साहब फिर से नए निकाह के लिए तैयारी में
जुट गए....

रानी पद्मिनी पर बुद्धिजीवियों से कुछ सवाल

ये विषय महज एक फिल्म तक सीमित नहीं है . ये विषय एक मौक़ा है इतिहास से उन पलों को खोज निकालने का जो आगे भविष्य में कई स्थानों पर उठ कर फिर खड़े हो सकते हैं . कश्मीर और पाकिस्तान जैसी तमाम जगहों पर तो खड़े भी हो चुके हैं . अब समय है इसी मौके पर ये भी जान लेने का कि दुर्दांत आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी के आने पर जो चित्तौड़ में हुआ वो अब तक किसी अन्य नरेश और सम्राट आदि के आने पर क्यों नहीं हुआ था ?
युद्ध और शांति आदि इतिहास में दोनों साथ साथ चले हैं . अक्सर एक नरेश दूसरे नरेश को हरा कर उसके राज्य को अपनी सीमाओं में मिला लिया करता था लेकिन जो वीभत्स रूप क्रूर आक्रांता के कारण चित्तौड़ का हुआ वो संसार में अद्वितीय क्यों है ? अलाउद्दीन खिलज़ी को वो शिक्षा किस ने दी या कहाँ से मिली थी जो ना सिर्फ महारानी पद्मावती अपितु उनके राज्य की हर नारी ने खुद को आग में स्वाहा कर लिया…
यकीनन ये ऐसा सवाल है जो इतिहास को तोड़ कर लिखने वालों के साथ टी वी पर बैठ कर लच्छेदार बातें करने वालो के हर रसीले जवाब को एक पल में ध्वस्त कर देता है . जौहर का अर्थ होता है खुद को स्वाहा कर देना और ये किसी भी स्वाभिमानी नारी का अंतिम चरण होता है . संसार जानना चाहता है क्रूरता की उस अंतिम पराकाष्टा और नीचता के उस अंतिम बिंदु को जो अलाउद्दीन ही नहीं तमाम आक्रन्ता ले कर साथ आये थे और जिसके शिकार हिन्दू हुए हैं कई हजार सालों से और जो अब तक जारी है अनवरत उसी हालत में . कितने मज़हबी ठेकेदारों में ये दम है जो अलाउद्दीन के आक्रमण के पीछे छिपी उस सोच को खुल कर चैनल पर आ कर बता सकते हैं जो ना सिर्फ रानी पद्मावती अपितु उस राज्य की हर नारी को खुद को स्वाहा करने के लिए आतुर कर देता है ..
संसार आतंक के उस अंतिम स्तर की सोच को इसी समय जानना चाहता है . यकीनन सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का विरोध , डी जी वंजारा का विरोध आदि करने वालों के मुँह से कभी भी अलाउद्दीन का विरोध न सुनने के बाद ये जरूर जाहिर होता है कि कई अभी भी उस जल्लाद की विचारधारा से सहमत होंगे और उनकी ये सहमति कब कोई नया अलाउद्दीन बना कर ला देगी ये कहा नहीं जा सकता .. इन नए अलाउद्दीन के आगे अब हिन्दू समाज कोई नई पद्मवती स्वाहा करने के लिए कतई तैयार नहीं है इसलिए अब समय है कि समाज में छिपे उन सभी अलाउद्दीन की पहिचान हो जाए क्योकि बेटी बचाओ अभियान के तहत ये कार्य सबसे ज्यादा जरूरी होता है . बेटियों को गर्भ में मार देने वाले तमाम डॉक्टर यकीनन घृणा के पात्र हैं जो जेलों में चक्की पीस रहे हैं पर बेटियों , माताओ और बहनो को जिन्दा जल जाने पर मजबूर कर देने वाले जल्लाद को किताबों में पढ़ाया जाना और उसके कई समर्थक होना इस देश का दुर्भाग्य क्यों न माना जाय 

सोमवार, 20 नवंबर 2017

यादें बचपन की

और शाम को अँधेरा होने तक
खेलते रहना क्रिकेट..
उतना अँधेरा जब गेंद दिखे या न दिखे
लेकिन उसके सिर्फ टप्पे की आवाज सुनाई दे..
घुटनो तक मिटटी में सने,
पूरी शर्ट पसीने में भीगी हुई, हाथो पर जमे मैल से बेपरवाह मैदान से वापस घर आते हुए
घर में घुसना दबे पाँव..
मुंह हाथ धो के
राजा बेटा बन के बैठ जाना पढ़ने
तब तक
जब तक पापा का डायलॉग न ख़त्म हो जाए
और माँ खाने के लिए आवाज न दे दे.

नये देशों का सृजन

हाल ही में तीन नए देशों का सृजन हुआ है।

ईस्ट तिमोर,

दक्षिणी सूडान

और

कोसोवो।

क्या हम अधिकांश भारतीयों को यह पता है इन देशों का निर्माण किस आधार पर हुआ है?

जिन्हें नहीं पता है उनके लिए जानकारी है कि इन देशों का निर्माण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण हुआ है।

ईस्ट तिमोर

जो इंडोनेशिया का एक भाग था में पहले ईसाइयों की आबादी बहुत कम थी, मुसलमानों एवं अन्य मत के मानने वाले लोगों की आबादी 80% से अधिक थी केवल 50 वर्षों में ईसाई मिशनरियों के प्रयत्न से ईस्ट तिमोर में ईसाइयों की जनसंख्या 80% से अधिक हो गई, परिणाम स्वरुप संयुक्त राष्ट्र के दखल से जनमत संग्रह करा कर ईस्ट तिमोर नाम के देश का निर्माण कर दिया गया। कोई युद्ध नहीं हुआ।

दक्षिणी सूडान

सूडान के दक्षिणी क्षेत्र में गरीबी थी,

मिशनरियों के प्रभाव में कुछ आदिवासी लोगों को पहले ही ईसाई बनाया गया।

धीरे धीरे इस मुस्लिम बहुल देश को दक्षिणी क्षेत्र में ईसाइयों से भर दिया गया।

फिर गृह युद्ध करा दिया गया। शांति प्रयास संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में हुए और परिणिति दक्षिणी सूडान को काटकर ईसाई देश के रूप में नए देश की मान्यता दे दी गई।

कोसोवो

सर्बिया के भीतर एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें खदानें बहुत अधिक थीं। इन खदानों में काम करने के लिए अल्बानियाई मूल के मुसलमानों को मजदूर के रूप में लाया गया था।कालांतर में इनकी संख्या बढ़ गई। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद सर्बिया स्वतंत्र देश बना। लेकिन मुसलमानों ने सर्बों के अधीन रहना स्वीकार नहीं किया और कोसोवो को अलग देश बनाने की मांग किया। गृहयुद्ध जैसी स्थिति कई वर्षों तक रही। फिर नया देश बन गया।

प्रश्न उठता है कि इस नए बने देश से हमारा क्या संबंध ?

मित्रों

भारत के कई क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जनसांख्यकीय परिवर्तन किए जा रहे हैं।

हालाँकि बहुसंख्यक आबादी इससे अनजान है।

विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों मे ऐसा होने से गैरकानूनी एवं आतंकी गतिविधियां बढ़ रही हैं।

यदि हम भारत की अखंडता बनाए रखना चाहते हैं तो स्थानीय प्रशासन से मिलकर हमें समस्या का समाधान खोजना चाहिए। आखिर हम भी तो भारत

किस्से या हकीकत

........................
कितना अपना लगता है, योगी। ऐसे जैसे , हम में से ही कोई उठकर सिनेमा में घुस गया हो। बेतरतीब कपड़ें , बिखरें बाल, लच्छे दार मगर सच्ची बातें। अदा को अंदाज बनाता।
जो दिख जाए वहीं बोलने के आदी होना और सीधी-साधी जिंदगी जीते जीते फ़सादी लगने लगना। कभी कभार जिंदगी से दब जाने के बावजूद आंखों में आगे न दबने की कसक रखना।
बिजनेस क्लास में बैठने के वितीय अभिमान को "टाँग पसार के बैठेंगे " कहकर हल्का कर देना। अपने नजरिये का सच दूसरों को भी दिखाना। दूसरे के सच से इतिफाक न रखना।
जिस से करना , जब भी करना......टूट के मोहब्बत करना । उसकी गीतें सुनना, अपनी बातें बताना। रूह से रूह जोड़ लेना। खाली वक्त में बस इश्क़ सोचना। और फिर एक दिन बेवजह सबकुछ छोड़ के वापस मुड़ जाना। बिना इस बात के फिक्र के सामने वाला पे क्या गुजरी होगी?
सबकुछ भूला देना फिर एक दिन उसकी याद आने पे कुशन में आंखे देकर रो देना । तब, सोचना की वो भी मेरे लिए ऐसे ही रोई होगी।
दर्द में होकर भी प्रेम के अधूरेपन को जज्ब न करने का जज्बा रखना और किसी का हाथ अपने कमर पे पाकर फिर से प्यार को बढ़ जाना। इस बार भी घनघोर करना ।आकंठ डूब जाना। पुरानी यादों को दोहराना और दुहराते दुहराते एक दिन फिर से ऊब जाना और एक दफा फिर से सबकुछ छोड़ देना।
अधूरेपन की कसक का अब आदत बन जाना मग़र नई लड़की से सब बढ़िया करने की कोशिश में करना और इन्हीं कोशिशों में फिर से ऊब जाना ..... या यूं कहिये की जिंदगी के मार्फ़त ऊबा दिया जाना।
मुहब्बत , आशिकी, इश्क़ ,प्रेम ..... सब कुछ शब्दों का फरेब लगना मगर फरेब में फंसने को नियति मान लेना।
नई लड़कियों से दिल बहलाते बहलाते......फिर से किन्ही ख़ास आंखों के काजल में अटक जाना। फिर इश्क़ करना। इस दफा , अलहदा करने, अपने ढंग से करना। अल्हड़ हो जाना । और फिर सामने वाले के इश्क़ का खेल हो जाना । खुद मोहरें बन पिटते जाना। जिस अना, अहम, से गिरेबाँ ऊंची रहती हो.......उनको बिखरते देखते रहना। सब कुछ अपने हाथों में होने के बावजूद , दिल के इशारों का बाट जोहना। किश्तों में टूटना।
मगर इन सब बातों के बावजूद योगी बने रहना ,पुरानी बेतरतीबी से वास्ता रखना, गला बेलौस और किरदार ठंडा रखना , अधूरे शायर को जिंदा रखने और
फिर ख़ालीपने के दौर में शारिक कैफ़ी को सोचना ....
निगाहें नीचीं हुई हैं मेरी
ये टूटने को घड़ी है मेरी
ये काम दोनो तरफ हुआ है
उसे भी आदत पड़ी है मेरी।
.................................
एक बार तो जरूर देखिए "करीब करीब सिंगल" अगर आपकी जिंदगी में भी किस्से हो, कांड हो। रणविजय भैया (इरफ़ान खान) फेवरेट हैं, इसलिए देखने को नही कर रहे है...वो लड़की अच्छी लगी है जो बस काज़ल लगाकर जान लेती है..... एक ऐसी लड़की की तरह। ।
जिसको कहदो ,तुम ड्रीम गर्ल हो तो वो कहे......बस सपनों में।

रविवार, 19 नवंबर 2017

pdmawati

कहते हैं जब नादिर शाह ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया था, तो जामा मस्जिद के ऊपर चढ़कर एक तलवार छत पर गाड़ दी थी और अपने जिहादियों को हुक्म दिया था कि जब तक ये तलवार ना उठे, क़त्ल-ए-आम ना रुके..और रुका भी नहीं !
अहमद शाह अब्दाली जब लाहौर से निकला, तो ये हुक्म दिया कि वापस आऊं तो शहर के चारों तरफ नरमुंड का सैलाब हो..और यह हुआ भी!
इनको सिर्फ लुटेरा बताकर इतिहास ख़त्म कर देने वाले वामी दोगले जब औरंगजेब को माननीय बताने लगते हैं, तो हैरानी कैसी ?
ये तो इनके नायक हैं..
दिल्ली में एक लाख लोगों को काटने वाला तैमूर हो या राजपूतों के खून का प्यासा अल्लाउद्दीन खिलजी..
ये सब इनके नायक हैं! तारिक-बिन-जियाद से लेकर ओसामा बिन लादेन तक सब माननीय हैं..
किसको फर्क पड़ता है कि गुरु तेग बहादुर के साथ क्या हुआ ?
या संभाजी के साथ क्या हुआ..?
सहिष्णुता सिखाता है ना हिंदुत्व.. तो ये सब स्वीकार करो! अपने पूर्वजों के कातिलों को अपना भगवान स्वीकार करो और तब तक करो जब तक कि स्वयं ख़त्म ना हो जाओ !!
तुम्हारे पास गंधार नहीं रहा, लाहौर नहीं रहा, सिंध, ननकाना साहिब, हिंगलाज भी नहीं रहा..
और तुम्हारा वहम हट जाए तो जानोगे कि कश्मीर, बंगाल और केरल भी लगभग छिन ही चुके हैं। मगर जाने दो, कौन बेवकूफ सोचे..
टी.वी. खोलो रे.. तैमूर की अम्मी की फिल्म आ रही है..!!
जहां एक ओर महारानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा सुनकर मन आनन्द विभोर हो गया कि लाख विपरीत परिस्थितियों से घिरे होने के बाद भी अपने गौरव और मान सम्मान को आंच नहीं आने दी और अंततः प्राण आहूति दी । महारानी लक्ष्मीबाई इतिहास में अमर हुई , उनका नाम देश के बच्चे बच्चे के मुंह पर आया और हर भारतवासी की प्रेरणास्रोत बनी ।
वहीं दूसरी ओर महारानी के दत्तक पुत्र के जीवन की दुश्वारियों पर मन द्रवित हो उठा जिसका पीछा दुर्भाग्य ने आजीवन न छोड़ा । दर दर भटकते रहे फिर भी किसी ने सहायता न की और जिन्होंने सहायता की तो स्वार्थ प्रबलता के साथ की ।
देश मे मक्कारों का वृहद अनुपात आज से ही नहीं पहले भी था । महारानी लक्ष्मीबाई का भी साथ बहुत से राजाओं ने न दिया । वास्तव में जितना हमे अपनों ने मारा है उतना गैरों ने नहीं मारा और वही इतिहास आज भी दोहराया जा रहा है ।
#गावके_झरोखे_से
सवेरे सवेरे महिला निकल ली है खिलहान की ओर सिर पर तिरपाल-बोरी-दउरी लिए। धान सटकाया जायेगा वहाँ।
तिरपाल में इकट्ठा किया जायेगा और अन्न और आधा आधा बांट कर अपना हिस्सा बोरियों  में भर क्र घर लौटेगी संझा को।

इससे साल भर के चावल का इंतजाम हो जायेगा

बस इतनी सी थी ये कहानी मेरे छोटे से गांव की आगे भी जारी रहेगी ;
राजा रत्न सिंह थे ,
चित्तौड़ था ...
अलाउद्दीन खिलजी था......
चित्तौड़ पर हमला हुआ था.......
बस पद्मावती काल्पनिक थी....
हद है दोगलेपन की.....  

गुरुवार, 1 जून 2017

नमस्कार एक बार फिर मै आप लोगो के बीच लेके आया हु कहनियाँ  का दौर जहा शायद  आप  मिलेंगे खुद से जो आपके आस पास लेके जायेगी उन पुरानी  दुनिया में जहा से आप ने आपना बचपन सुरु किया था .!बात उस समय की है जब हमे देश और दुनिया की ज्यादा समझ नही थी और नही ज्यादा जानकारी ..उम्र के साथ सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा था | कुछ समझ में ही नही आ रहा था की क्या  हो रहा है आस पास .....

जब तक आप कुछ

बुधवार, 24 मई 2017

अभी मेरी लेखन परम्परा की शुरुआत  है हो सकता है काफी मात्रा में त्रुटी हो और कुछ पोस्ट अधूरे भी हो जो की लिखते समय उब जाना मात्रा एक कारन है लेकिन आगे से इस बात का काफी ख्याल रखा जायेगा .अपने छोटा समझ के कुछ लेखन की विधा और अपने सुझाव जरुर दे जिससे हमे उम्मीद है कि हम अपने इस प्रतिभा को आम जन मानस तक पहुचाने में समर्थ हो सकूंगा .हमे आपके सुझाव का बेसब्री से इंतजार है .


हमारे मन मे काफी ज्यदा विचार रहते है किसी भुई तात्कालिक मुद्दे को औरकिसी संकट को लेके लेकिन मेरे वही कमजोरी जो कि उब जाने वाली परम्परा से मै निजात पाना चाहता हु .अगर इस का भी कोई उपाय हो तो जरुर बताये .

आपका छोटा भाई शिव मिश्र 
 whatsaap no -7376711565

रविवार, 30 अप्रैल 2017

हम बात करने जा रहे है आज के राजनीतिक दौर की जहां पर शायद अब किसी भी पार्टी की कोई राजनेतिक के हिसाब से अपने वादे और एजेंडा और उसके मुलभुत सिधान्त पर नही चलती है.....
लेख आगे जारीरहेगी................................